Wednesday, July 10, 2019

कर्नाटक में राजनीतिक दलों का 'कर-नाटक', जनता परेशान



सुरभि भावसार 

कर्नाटक का नाटक एक बार फिर शुरू हो गया है। इस्तीफों का दौर और सियासी उठा-पटक के बीच किसी का ध्यान उस जनता की तरफ नहीं जा रहा जिसनें इन नेताओं को यहां पहुंचाया है। जनता के 'स्वामी' बन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे कुमारअब केवल अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुए है। इसके साथ ही पिछले दरवाजे से राज्य की सत्ता में आई कांग्रेस को भी सत्ता की भूख सता रही है। कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही पार्टियां चुनाव के समय जनता से किए तमाम वादें भूल गई। 

हालांकि ऐसी स्थिति कर्नाटक में पहली बार नहीं बनी है। इससे पहले भी राज्य में सियासी नाटक हुए है। बात करें विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने की तो उस समय भी भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी लेकिन बहुमत साबित नहीं पाई और सत्ता से हाथ धोना पड़ा। इधर कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस ने राज्य में अपनी सत्ता बना ली।

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सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही भाजपा ने राज्य में 'ऑपरेशन लोटस' चलाया और गठबंधन पर ख़तरा मंडराने लगा था। कांग्रेस और जेडीएस के बीच चल रहे मतभेदों के बीच दो निर्दलीय विधायकों ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी थी और भाजपा को समर्थन देने के लिए राज्यपाल को पत्र भी लिखा दिया था। हालांकि कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा था कि कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार को कोई खतरा नहीं है। सरकार को बहुमत के लिए 113 विधायक चाहिए, जबकि सरकार के पास बसपा विधायक को मिलाकर कुल 117 विधायकों का समर्थन हासिल है।

कुमारस्वामी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल यही ख़त्म नहीं हुए। लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखी मोदी की सुनामी का असर भी कर्नाटक की राजनीति पर देखने को मिला। भीषण पराजय देखने के बाद जेडीएम के प्रदेश अध्यक्ष एच विश्‍वनाथ ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया। 

ऐसी स्थिति में यह बात सामने आ रही है कि जिस विकास के मुद्दे पर राज्य की जनता ने पार्टियों को जनादेश दिया था, ताकि वे प्रदेश के लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और राज्य का विकास कर सके लेकिन इसके विपरीत प्रदेश में सियासी उठा-पटक जारी है और राज्य का विकास न होकर राजनीतिक दलों का विकास जारी है, जिससे जनता खुदको ठगा महसूस कर रही है।

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इधर भाजपा भले ही खुलकर सामने नहीं आ रही है लेकिन अंदर ही अंदर सरकार बनाने के प्रयास तेज कर दिए है जिसका अंदाजा हाल ही में आए भाजपा नेताओं एक बयानों से लगाया जा सकता है। बीजेपी की हमेशा से ही कोशिश रही है कि कांग्रेस के 13 विधायक इस्तीफा दे दे और वह दो निर्दलीयों की मदद से बहुमत साबित कर सके। 

अब सवाल ये है कि कर्नाटक में लगातार हो रही सियासी उठा-पटक के बीच जनता की स्थिति क्या है? जनता ने भरोसा कर जिसे वोट दिया वो अब सिर्फ कुर्सी बचाने में लगे हुए है। बार-बार होने वाली इस सियासी ड्रामे में सत्ता बचाने के चक्कर में नेता जनता से किए वो तमाम वादें भूल गए है। क्या जनता अब ऐसे नेताओं पर दोबारा विशवास करेगी? यहां ये कहा जा सकता है कि जनता को बहुमत के साथ किसी एक सरकार को चुनना चाहिए, जिससे राज्य में सरकार गिरने की स्थिति न बनें और विकास कार्य भी चलता रहे। 








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