Friday, November 29, 2019

सपना साकार या सत्ता से प्यार!



सुरभि भावसार

राजनीति सिर्फ जनता की सेवा के लिए नहीं, यहां सत्ता भी सबको चाहिए होती है। तमाम उठा-पटक और सियासी घमासान के बीच उद्धव ठाकरे के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सज गया है। उद्धव ठाकरे ने भले ही अपने पिता बालासाहेब का सपना पूरा कर दिया है लेकिन सत्ता के लिए उन्हें अपने पिता की ही विचारधारा से समझौता करना पड़ा है। सत्ता ने शिवसेना को अपने मूल सिद्धांतों से दूर कर दिया। 

वो कहते है ना कि राजनीति जो कराए वो कम है। इसका सटीक उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला है। सत्ता के लिए शिवसेना ने अपने 30 साल पुराने साथी भाजपा का साथ छोड़कर अपने से उलट विचारधारा वाली एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। ये साफ़ है कि शिवसेना हमेशा से ही कट्टर हिंदुत्व की छवि को लेकर आगे बढ़ी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन में भी शिवसेना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

उद्धव ठाकरे के उलट विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना कई सवालों को जन्म दे रहा है। सवाल उठ रहे है कि उद्धव ठाकरे का सीएम बनना बालासाहेब का सपना पूरा करना है या फिर सत्ता से प्यार है? क्या शिवसेना ने सत्ता के लिए हिंदुत्व की राजनीति से समझौता कर लिया? कुछ तो यहां तक कह रहे है कि उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना पिता का सपना साकार करना कम और सत्ता के लिए प्यार ज्यादा लग रहा है। 

बालासाहेब का सपना पूरा करने वाले उद्धव ठाकरे ये कैसे भूल सकते है कि उनके पिता ने कभी हिंदुत्व से समझौता नहीं किया था। पिछले चार दशकों से जो शिवसेना कट्टर हिंदुत्व की छवि और सिद्धांतों को लेकर राजनीति में शिखर तक पहुंची, वहीं सत्ता के लिए अपने मूल सिद्धांतों के साथ समझौता कर बैठी है। 

शिवसेना का ये बदला रूप उन कार्यकर्ताओं को नहीं सुहा रहा जो सड़कों पर हिंदुत्व की राजनीति करते थे क्योकि अब उस आम कार्यकर्ता को कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन वाली सरकार के चलते कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अनुसार राजनीति करने के लिए विवश होना पड़ेगा। 

उद्धव ठाकरे की जिद के आगे भले ही शिवसैनिक दबे मन से कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन वाली सरकार को स्वीकार कर रहे हो लेकिन ये चुप्पी कब तक बनी रहेगी ये तो समय ही बताएगा। कहा जा रहा है कि सीएम की कुर्सी भले ही उद्धव ठाकरे को मिली है लेकिन सत्ता की असली चाबी एनसीपी प्रमुख शरद पंवार के हाथों में है। ऐसे में राजनीतिक पंडित उद्धव ठाकरे सरकार को दूर का सफर तय करते नहीं देख रहे हैं।

Saturday, November 2, 2019

ये कैसी सौदेबाज़ी!



सुरभि भावसार

हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों सहित क्षेत्रीय पार्टियों का सफया हो गया और बीजेपी अपने महाजनादेश के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई। लोकसभा चुनाव में भाजपा भले ही राष्ट्रवाद के दम पर केंद्र की कुर्सी पर विराजमान हुई है, लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव ने सियासी तस्वीर बदल कर रख दी है। इनमें बीजेपी को क्षेत्रीय दलों के सामने झुकने पर मजबूर होना पड़ा है।

वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने लगा है। यही कारण है कि क्षेत्रीय दल राजनीति को व्यापारिक सौदे में बदलने की सीनाजोरी कर रहे हैं क्योकि उसका पूरा खेल सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने का रहता है।

कड़वा जरुर है लेकिन ये सच है। आज की राजनीति में खुले तौर पर भाव-ताव हो रहे है। राजनीति में सौदेबाजी की शुरुआत उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के उदय के बाद हुई थी। ऐसी राजनीति की शुरुआत बेशक क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण हुई है लेकिन राष्ट्रीय दल भी इससे अछूते नहीं रहे है। सौदेबाज़ी की ये राजनीति कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार में भी देखने को मिली थी।

हालांकि शिवसेना भले ही मुख्यमंत्री पद के लिए 50-50 के फ़ॉर्मूले पर अड़ी हो लेकिन पार्टी की बैठक में अपने युवा नेता आदित्य ठाकरे को पीछे रखकर वरिष्ठ नेता एकनाथ शिन्दे को विधायक दल का नेता बनाकर शिवसेना ने संकेत दिया है कि वह अपनी शर्तों में ढील छोड़ने के लिए तैयार है। खैर जो भी है लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना सरकार का ही गठन होना है क्योकि इसके अलवा कोई और दूसरा विकल्प ही नहीं है।

Saturday, September 7, 2019

चंद्रयान-2: डिगे नहीं है, अडिग है हम, लौटकर फिर आएंगे



सुरभि भावसार 

जीरो का आविष्कार हो या चांद पर जाने का सपना, भारत ने हमेशा ही अपने कारनामों से दुनिया को चैंकाया है। इस बार भले ही चांद पर पहुंचने में कामयाब नहीं हुए, लेकिन हौसले बुलंदी पर है। हालांकि चंद्रयान-2 के चांद से चंद कदम दूर तक पहुंचने के बाद संपर्क टूट गया था। इससे वैज्ञानिक निराश हो गए थे, मगर वह एक बार फिर पूरे जोश के साथ उठ खड़े हुए हैं। मिशन भले ही सफल नहीं हो पाया हो, पर हर भारतीय को वैज्ञानिकों की सालों की मेहनत पर गर्व है और इस सफलता पर वैज्ञानिकों को सेल्यूट किया है। 

ऐसा नहीं है कि चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर क्षतिग्रस्त हो गया है, उसका ऑर्बिटर अब भी पूरी शान से चांद के चक्कर लगा रहा है, जो लगभग सालभर तक शोध करेगा, साथ ही हर छोटी-छोटी जानकारी धरती पर भेजेगा। यह भी किसी सफलता से कम नहीं है, दुनिया के अन्य देशों के मिशन तो चांद के चक्कर लगाने से पहले ही धराशायी हो गए थे, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने चांद तक पहुंचने में सफलता हासिल की है।

उपलब्धि की बात करें तो भारत से पहले अमेरिका, रूस और चीन चांद तक पहुंचे चुके हैं, मगर हम इस बार रह गए हैं, किंतु अगली बार लक्ष्य को भेदकर ही मानेंगे। ऐसा नहीं है कि ये तीनों देशों अपने दम पर चांद तक पहुंचे, इसके लिए उनको भारतीय शक्ति का सहारा लेना पड़ा था। भारत के दशमलव और जीरो की खोज के बाद ही दुनिया धरती और चांद की दूरी का अंदाजा लगा पाई है। यदि भारत दुनिया को दशमलव नहीं देता तो आज इन देशों का भी चांद पर जाना मुमकिन नहीं था। 

हिंदुस्तान ने कई ऐसे कारनामे किए हैं, जिससे दुनिया की आंखें फटी रह गई। मंगल गृह पर तिरंगा फहराने का रिकॉर्ड दुनिया में केवल भारत के नाम है। ये भारत ही है, जिसने दुनिया को चांद पर पानी होने की जानकारी दी है। हमने ही 100 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करके नया इतिहास रचा है। जब सफलता इतनी हो तो एक-दो रुकावट हमें पीछे नहीं कर सकती।

आज चांद पर जाने का मिशन पूरा नहीं हुआ तो क्या हुआ, ये सपना टूटा नहीं है और ना ही हौसला कम हुआ है। आज चंद्रमा को छूने की हमारी इच्छाशक्ति और दृढ़ हुई है, संकल्प और प्रबल हुआ है। अब हम दोगुने हौसले से खड़े होंगे, हमारा विश्वास और बढ़ गया है। हिंदुस्तान एक असफलता से टूटकर मायूस होने वालों में से नहीं, बल्कि दोगुने जोश के साथ खड़े होकर लक्ष्य प्राप्त कर बैठने वालों में से है। हम उठेंगे, दौड़ेंगे और चांद पर भी पहुंचेंगे। आखिरी कदम पर भले ही रुकावट आई हो, लेकिन हम डिगे नहीं है।

Tuesday, August 6, 2019

नया इतिहास, नया कश्मीर



सुरभि भावसार 

नहीं पड़ेंगे अब शेरों के गालों पर थप्पड़, कश्मीर में भी गूंजेगा 'जय हिंद' का नारा, पूरे हिंदुस्तान में लहराएगा सिर्फ तिरंगा क्योंकि अब इतिहास बदल गया है। 370 में बंधा  हुआ कश्मीर अब आजाद हो गया है, डल झील और गंगा की धार एक हो गई है, भारत अखंड हो गया है, यह सब मुमकिन हो पाया है तो सिर्फ 56 इंच के फैसले के कारण

मोदी सरकार का यह फैसला वाकई काबिले तारीफ है। कांग्रेस आज मोदी सरकार के इस फैसले का जिस हिम्मत से विरोध कर रही है शायद इतनी हिम्मत से उस समय खड़ी हो जाती तो शायद कश्मीर के कुछ हिस्से पर आज पाकिस्तान का कब्जा नहीं होता। खैर दाद देनी पड़ेगी मोदी सरकार की उस हिम्मत और फैसले की जिसने कश्मीर का राग अलपने वाले पाकिस्तान को उसकी औकात दिखा दी। 

56 इंच के फैसले ने कश्मीर के विकास में आने वाले रोड़े को तो जड़ से खत्म कर दिया लेकिन लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह के तेवर कुछ और ही कह रहे थे। लग रहा है कि  उनकी नजर पीओके पर भी है। गृहमंत्री ने जब सदन में कहा कि 'जब मैं जम्मू कश्मीर बोलता हूं तो उसका मतलब पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भी है, कश्मीर के लिए हम अपनी जान भी दे देंगे' इस दौरान उनका गुस्सा देखकर लग रहा था कि पीओके अभी बाकी है। सदन में उनके तेवर इतने कड़े थे जिसको देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि शायद अब अमित शाह पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ा कर ही दम लेंगे।

मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले ने इतिहास  रच दिया है लेकिन एक बात यह समझ में नहीं आ रही कि जो लोग देश को ही अपना सब कुछ बताते थे, देश के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, आज वही लोग क्यों सरकार के उस फैसले के विरोध में उतर आए हैं जिससे मां भारती का सिर गर्व से ऊंचा हो रहा है। क्यों आज वही लोग इस फैसले के खिलाफ हो गए हैं जो भारत को अखंड बना रहा है।

कश्मीर में कल सूरज तो निकलेगा लेकिन सुबह नई होगी, झेलम का पानी तो वही रहेगा लेकिन अब आजादी से बहेगा, खूबसूरत वादियों में देशभक्ति की हवा बहेगी, कश्मीर की माटी में आतंक का बारूद नहीं चंदन की खुशबू महकेगी क्योकि ये ऩया कश्मीर है।

Sunday, July 28, 2019

आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से डर कैसा?


सुरभि भावसार 

जब देश के जवान सरहद पर तैनात होते है तो वो राजनीति नही करते। मां भारती की रक्षा के लिए उस जवान के लिए देशसेवा ही सबकुछ होती है। खून में देशभक्ति, जुबान पर 'जय हिंद' का नारा और आंखों में दुश्मनों के लिए गुस्सा, भारतीय सेना का देश के लिए यही समर्पण देखकर ही दुश्मन कांप उठता है। इन जवानों को दिल्ली की गद्दी पर बैठने वालों के कानून से कोई मतलब नहीं होता लेकिन जब सेना के समर्थन की बात आती है तो कुछ राजनीतिक दल वोटबैंक के लिए इसका विरोध करने से भी पीछे नहीं हटते है।


आतंकियों के खिलाफ जब कोई बात सदन में हो या सदन के बाहर हो तो हमेशा उसका विरोध करते है। जब सदन में आतंकवाद के खिलाफ सरकार क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 (यूएपीए बिल) लाई तो सोनिया गांधी सहित पूरी कांग्रेस ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

दरअसल, इस बिल से एनआईए को मजबूती मिलेगी और आतंकवाद पर नकेल कसेगी। इस बिल के तहत यदि कोई व्यक्ति आंतकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है या उसमें भाग लेता है तो उसे आतंकवादी घोषित किया जाएगा। यानी अब सरकार किसी संगठन के साथ-साथ किसी व्यक्लती विशेष को भी आतंकी घोषित कर सकती है।

आतंकवाद के खिलाफ इस अहम् बिल पर चर्चा के दौरान कांग्रेस का सदन से वॉकआउट कर जाना तमाम सवालों को जन्म दे रहा है। कांग्रेस को आतंकियों को आर्थिक मदद करने वाले ओर जेहादी साहित्य से आतंकी बनाने वाले लोगो से क्या सहानुभूति है जो कांग्रेस ने वोट करने की बजाय सदन का बहिष्कार कर दिया? कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस देश के साथ खड़ी है या आतंकियों के साथ?


इधर, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती कश्मीर में अतिरिक्त 10 हजार जवानों की तैनाती का विरोध कर रहीं हैं। उनक कहना है कि कश्मीर में अतिरिक्त जवानों की तैनाती ने डर का माहौल पैदा कर दिया है। आज महबूबा को उस सेना से डर लग रहा है जो सेना कश्मीर में आई बाढ़ के समर कश्मीरियों के लिए देवदूत बनकर खड़ी हो गई थी। महबूबा को सेना की तैनाती का डर है या आतंकवाद के खात्मे का ?

यहां ये कहना गलत नही होगा किआतंकवाद को ख़त्म करने के लिए केवल आतंकवादियों को ख़त्म करना ही काफी नहीं है। इसके लिए सबसे पहले उन्हें ख़त्म करना होगा जो आतंकियों को आथिॅक सहायता देते है और उन्हें पालते हैं। ऐसे में जब तक देश के सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आकर एक स्वर में आतंकवाद के पनाहगारों को जड़ से ख़त्म करने के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक देश में कितने भी आतंकियों का सफाया कर दे, दीमक रुपी आतंकवाद का पूर्ण रूप से क्रियाक्रम असंभव सा लगता है।



Saturday, July 20, 2019

नरम रवैया और साफ़-सुथरी छवि के लिए हमेशा याद की जाएंगी शीला दीक्षित


सुरभि भावसार 

राजनीति का चमकता सितारा और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित अब हमारे बीच नहीं रही। शनिवार को 81 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और दिल्‍ली की तीन बार मुख्‍यमंत्री रहीं शीला दीक्षित कांग्रेस पार्टी का बड़ा चेहरा मानी जाती थी।

राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और दिल्‍ली की तीन बार मुख्‍यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को कॉलेज के जमाने से ही राजनीति में दिलचस्पी थी। मुख्यमंत्री रहने के बाद शीला दीक्षित केरल की राज्यपाल भी बनीं। 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद रहीं।

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शीला दीक्षित ने दिल्ली में कई विकास कार्य किए है। शीला दीक्षित का राजनीतिक सफ़र बढ़िया चल रहा था तभी आम आदमी पार्टी वजूद में आई। आम आदमी पार्टी की ऐसी आंधी चली कि शीला को हार का सामना करना पड़ा। शीला दीक्षित की हार को लेकर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वह विरोधी लहर का शिकार हुई थी, उनके काम में कोई कमी नहीं थी और ना ही जनता में उनको लेकर कोई नाराजगी थी।

मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी उन्हें जनता का प्यार मिलता रहा। शीला दीक्षित को कांग्रेस उन चंद नेताओं में गिना जता है जो पार्टी के बुरे समय में साथ रहे। उन्हें  एक मंजी हुई राजनेता के रूप में जाना जाता रहा है। उनके नरम रवैया के लिए भी अक्सर तारीफ की जाती है ।

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शीला दीक्षित ने कुछ ऐसे काम भी किए है जिसने लोगों की जिंदगी पर भी गहरा असर डाला। उन्‍होंने लड़कियों को स्‍कूल में लाने के लिए पहली बार 'सेनेटरी नैपकिन' बंटवाया था। दिल्ली में पहले फ्लाईओवर का आधार, मेट्रो, सीएनजी और दिल्‍ली की हरियाली शीला दीक्षित की ही देन है। आज देश ने राजनीति का चमकता सितारा खो दिया है।








Friday, July 19, 2019

रेप कर भागा आरोपी, तो सऊदी से घसीटकर भारत लाई ये आईपीएस ऑफिसर



रेप की घटनाएं पुलिस के लिए आम बन गई है। आरोपी छोटी-छोटी बच्चियों को हवस का शिकार बनाकर विदेश भाग जाते है और पुलिस  और भारतीय एजेंसियों के लिए यह एक छोटा केस हो जाता है। पीड़ित बच्ची आत्महत्या कर लेती है लेकिन घटना के दो साल बाद भी उसके आरोपी को नहीं पकड़ पाती। इसी बीच एंट्री होती है एक ऐसी आईपीएस ऑफिसर की जो आरोपी को विदेश से घसीटकर ले आती है। 

जी हां, हम बात कर रहे है केरल के कोल्लम की आईपीएस ऑफिसर मेरिन जोसेफ की। मेरिन जोसेफ ही 13 साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले आरोपी को सऊदी अरब से घसीटकर भारत लाई है। 


दरअसल, मेरिन जब यहां की आईपीएस ऑफिसर बनी तो उन्होंने अपराध की सभी फाइलें मंगवाई। इस दौरान एक फाइल ऐसी निकली जिसका आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर था। जब मेरिन ने इस मामले की जांच की तो मामला 13 साल की बच्ची के साथ रेप का निकला। सुनील कुमार भद्रन नाम के आरोपी ने 13 साल की बच्ची के साथ 2017 में बलात्कार किया था। 

इस मामले में सबसे दुखद पहलू ये है कि बच्ची ने आत्महत्या कर ली। आरोपी का इंटरपोल इश्यु होने के बाद भी 2 साल तक उन्हें लाने में पुलिस नाकाम रही थी। इस बात की जानकारी लगने के बाद मेरिन ने यह केस अपने हाथों में लिया और फिर से इंटरपोल अरब, इंडियन एम्बेसी, इंटरनेशनल इन्वेस्टीगेशन सेल जैसे एजेंसियों से संपर्क किया। 


बच्ची के आरोपी को पकड़ने के लिए मेरिन ने दिन-रात एक कर दिया। आखिरकार खुद सऊदी अरब पहुंचकर आरोपी को पकड़कर ही दम लिया, जिसके बाद वह आरोपी को पिछले रविवार भारत घसीटकर लाई। 

आरोपी को सऊदी से लाकर मेरिन ने देश को बता दिया एक बच्ची के साथ दुष्कर्म कोई छोटा केस नहीं होता। बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म/ बलात्कार का ऐसा कोई पैमाना नहीं है जो तय कर सके कि ये केस छोटा है या बड़ा। देश में मेरिन जैसे पुलिस ऑफीसर हो जाए तो शायद बच्चियों के साथ ये घटनाएं होने से बच जाए।

Saturday, July 13, 2019

पिता की लाड़ली का वकील बना मीडिया!




सुरभि भावसार


बचपन में माता-पिता ने हाथ पकड़कर चलना सिखाया, बड़े हुए तो स्कूल भेज पढ़ाया-लिखाया, हर शौक पूरे किए, एक बार बोलने पर हर चीज हाजिर कर दी, आज वहीं बच्चे बड़े होकर दुनिया के सामने उन्हें गलत बता रहे हैं। आज प्यार इतना जरुरी हो गया है कि माता-पिता को ही जान का दुश्मन बताने लगे। भले ही भलाई के लिए मां ने फटकार लगाई हो, आज वह फटकार टॉर्चर बन गई। उस पिता ने कभी सोचा नहीं होगा कि उसके बच्चे बड़े होकर उसकी ही जगहंसाई कराएंगे।

मामला और कोई नहीं, भाजपा विधायक राजेश मिश्रा और उनकी बेटी साक्षी मिश्र का है। साक्षी ने अजितेश नाम के लड़के से प्यार किया और उस प्यार को अंजाम तक पहुंचाया। दोनों ने भागकर शादी कर ली। शादी के बाद साक्षी ने अपने पति के साथ वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। वीडियो में साक्षी अपने ही पिता से जान को खतरा बताती है और पुलिस से मदद की गुहार लगाती है।


वीडियो सामने आते ही कुछ न्यूज़ चैनल वाले इतनी हमदर्दी जताने लगते है कि उन्हें अपने स्टूडियो में बुला लेते है और दिनभर इसी मुद्दे पर लाइव चर्चा होने लगती है। लाइव कैमरे पर उनसे तमाम सवाल पूछे जाते है। यहां यह सवाल पूछ्ना गलत नहीं होगा कि क्या मीडिया का ऐसा करना सही है? क्या इससे समाज में सही संदेश जा रहा है? क्या भागकर शादी करने वालों की मदद अव मीडिया करेगा?

यहां बात गैर जाति में शादी करने की नहीं है। बात है गलत तरीके से शादी करने की, बात है तो मां-बाप के खिलाफ जाकर, उनके आशीर्वाद के बिना शादी करने की, बात है तो वीडियो डालकर उनकी जगहंसाई करने की। किसी का ये कदम उसके सच्चे प्यार की निशानी नहीं बल्कि ड्रामा है। एक लड़के को भी किसी की बेटी को भगाने से पहले सौ बार सोचन चाहिए।


साक्षी और अजितेश ने तो अपने मन की कर ली और कुछ मीडिया वाले  इस काम में उनका पूरा साथ दे रहे हैं। उनके वकील बनकर खड़े हो गए है लेकिन क्या किसी ने उस पिता के बारे में सोचा है जिसके लिए इससे बड़ी पीड़ा और कोई हो ही नहीं सकती। क्या बीत रही होगी उस पिता पर जिसने अपनी बेटी को फूलों की तरह पाला और आज वहीं बड़ी होकर एक लड़के के लिए उन्ही के खिलाफ खड़ी हो गई हो।

न्यूज़ चैनलों पर साक्षी को लेकर तमाम नौटंकियां चल रही है, हर कोई उसके पिता राजेश मिश्रा को कोस रहा है लेकिन किसी ने उसके पिता की आवाज नहीं सुनी। साखी के पिता ने कहा है 'मैं ना तो जात-पात में विश्वास रखता हूं और ना ही शादी के खिलाफ हूं। मेरी फिक्र भी हर पिता की तरह ही है।  वह लड़का ना ही कुछ कामाता है और ना ही कुछ काम करता है। इसके अलावा वह साक्षी ने 9 साल बड़ा है। मुझे साक्षी के भविष्य की चिंता है। मेरी जगह कोई और पिता होता तो वह भी ऐसे ही सोचता।'

इसके बाद हाल ही में इस मामले में नया ट्विस्ट आया है। सोशल मीडिया पर अजितेश की एक फोटो वायरल हो रही है, जिसको लेकर कहा जा रहा है कि अजितेश की सगाई भोपाल की रहने वाली एक लड़की से हुई थी। शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई थी। हालांकि बाद में ये सगाई तोड़ दी गई।

ऐसे में एक पिता की चिंता करना क्या गलत है? क्या माता-पिता का बेटी को गलत रास्ते पर जाने से रोकना गलत है? क्या एक बेटी का माता-पिता को पूरे देश के सामने इस तरह जलील करना सही है? कुछ चैनल टीआरपी के चक्कर में लगातार एक पिता का मानसिक रूप से शोषण कर रहे है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी  'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं' का संदेश देते हुए नजर आ रहे है, वहीं कुछ चैनल अप्रत्यक्ष तौर पर 'बेटी भागाओं, मीडिया के सामने आओ' जैसी विकृत मानसिकता को जन्म दे रहे है।

क्या एक पिता को अपनी बेटी के सही-गलत के बारे में सोचने का अधिकार नहीं है? हर पिता की हसरत होती है कि जब बेटी जवान हो जाए तब उसकी शादी एक अच्छे घर में हो और उसके सुसराल में उसे कोई तकलीफ ना हो। इसी सोच के भार से पिता अपनी पूरी जिंदगी बेटी के लिए कुर्बान कर देता है। यही इच्छा विधायक जी की भी थी लेकिन साक्षी ने अपने पिता के इन सपनो को चूर-चूर कर दिया।

हालांकि किसी लड़की को भी अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार है। शायद यही सोचकर साक्षी ने भी भागकर शादी की और जान का खतरा होने पर मीडिया के सामने भी आई और इलाहबाद हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगाई, जिसके बाद साक्षी को सुरक्षा भी मिली और मीडिया का समर्थन भी। वहीं विधायक मिश्रा भी कह चुके है कि साक्षी को जहां रहना है रहे लेकिन खुश रहे। जिसके बाद अब साक्षी को भी इस तरह अपने माता-पिता की जगहंसाई करवाना बंद कर देना चाहिए और चैन से अपने ससुराल वालों के साथ रहना चाहिए। 



Wednesday, July 10, 2019

कर्नाटक में राजनीतिक दलों का 'कर-नाटक', जनता परेशान



सुरभि भावसार 

कर्नाटक का नाटक एक बार फिर शुरू हो गया है। इस्तीफों का दौर और सियासी उठा-पटक के बीच किसी का ध्यान उस जनता की तरफ नहीं जा रहा जिसनें इन नेताओं को यहां पहुंचाया है। जनता के 'स्वामी' बन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे कुमारअब केवल अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुए है। इसके साथ ही पिछले दरवाजे से राज्य की सत्ता में आई कांग्रेस को भी सत्ता की भूख सता रही है। कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही पार्टियां चुनाव के समय जनता से किए तमाम वादें भूल गई। 

हालांकि ऐसी स्थिति कर्नाटक में पहली बार नहीं बनी है। इससे पहले भी राज्य में सियासी नाटक हुए है। बात करें विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने की तो उस समय भी भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी लेकिन बहुमत साबित नहीं पाई और सत्ता से हाथ धोना पड़ा। इधर कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस ने राज्य में अपनी सत्ता बना ली।

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सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही भाजपा ने राज्य में 'ऑपरेशन लोटस' चलाया और गठबंधन पर ख़तरा मंडराने लगा था। कांग्रेस और जेडीएस के बीच चल रहे मतभेदों के बीच दो निर्दलीय विधायकों ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी थी और भाजपा को समर्थन देने के लिए राज्यपाल को पत्र भी लिखा दिया था। हालांकि कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा था कि कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार को कोई खतरा नहीं है। सरकार को बहुमत के लिए 113 विधायक चाहिए, जबकि सरकार के पास बसपा विधायक को मिलाकर कुल 117 विधायकों का समर्थन हासिल है।

कुमारस्वामी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल यही ख़त्म नहीं हुए। लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखी मोदी की सुनामी का असर भी कर्नाटक की राजनीति पर देखने को मिला। भीषण पराजय देखने के बाद जेडीएम के प्रदेश अध्यक्ष एच विश्‍वनाथ ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया। 

ऐसी स्थिति में यह बात सामने आ रही है कि जिस विकास के मुद्दे पर राज्य की जनता ने पार्टियों को जनादेश दिया था, ताकि वे प्रदेश के लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और राज्य का विकास कर सके लेकिन इसके विपरीत प्रदेश में सियासी उठा-पटक जारी है और राज्य का विकास न होकर राजनीतिक दलों का विकास जारी है, जिससे जनता खुदको ठगा महसूस कर रही है।

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इधर भाजपा भले ही खुलकर सामने नहीं आ रही है लेकिन अंदर ही अंदर सरकार बनाने के प्रयास तेज कर दिए है जिसका अंदाजा हाल ही में आए भाजपा नेताओं एक बयानों से लगाया जा सकता है। बीजेपी की हमेशा से ही कोशिश रही है कि कांग्रेस के 13 विधायक इस्तीफा दे दे और वह दो निर्दलीयों की मदद से बहुमत साबित कर सके। 

अब सवाल ये है कि कर्नाटक में लगातार हो रही सियासी उठा-पटक के बीच जनता की स्थिति क्या है? जनता ने भरोसा कर जिसे वोट दिया वो अब सिर्फ कुर्सी बचाने में लगे हुए है। बार-बार होने वाली इस सियासी ड्रामे में सत्ता बचाने के चक्कर में नेता जनता से किए वो तमाम वादें भूल गए है। क्या जनता अब ऐसे नेताओं पर दोबारा विशवास करेगी? यहां ये कहा जा सकता है कि जनता को बहुमत के साथ किसी एक सरकार को चुनना चाहिए, जिससे राज्य में सरकार गिरने की स्थिति न बनें और विकास कार्य भी चलता रहे। 








Friday, July 5, 2019

आम आदमी को मिला सिर्फ 'धन्यवाद'?, कितना सही, कितना गलत



सुरभि भावसार 

प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार ने अपने पहले बाजार में किसानों और गांव पर सबसे ज्यादा फोकस किया। शिक्षा, व्यापार, किसान, विकास और महिलाओं के लिए बजट में कई ऐलान हुए। हालांकि बजट को लेकर कहा जा रहा है कि आम आदमी का हाथ खाली रह गया है। मोदी सरकार ने आम आदमी को सिर्फ धन्यवाद दिया है लेकिन ऐसा नहीं है। बजट को ध्यान से देखा जाए तो सरकार ने आम आदमी झोली में भी बहुत कुछ डाला है।

ये बात बिलकुल भी गलत नहीं है कि मिडिल क्लास की नजर टैक्स स्लैब पर थी और सरकार ने टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया है। आपकी इनकम 2 लाख हो या 10 लाख, आम आदमी को इसमें कोई राहत नहीं मिली है।

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अब यदि टैक्स से हटकर देखा जाए तो वित्त मंत्री ने आम आदमी के लिए कई ऐलान किए है। सरकार ने घर खरीदने वालों को रहत देते हुए हाउसिंग लोन में 3.5 लाख रुपये की छूट दी है। पहले यह छूट 2 लाख रुपये थी। इसके साथ ही 45 लाख का घर खरीदने पर 1.5 लाख तक की छूट मिलेगी।

इतना ही नहीं सरकार ने  ई-वाहन पर लगने वाले 12 फीसदी GST को घटाकर 5 फीसदी कर दिया है। साथ ही इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदने के लिए जो लोन लिया गया है उस पर दिए जाने वाले ब्याज पर 1.5 लाख रुपए की अतिरिक्त आयकर छूट मिलेगी।

सरकार ने भले ही 2 करोड़ से 5 करोड़ और 5 करोड़ से ऊपर की व्यक्तिगत आय पर 3 फीसदी और 7 फीसदी अतिरिक्त टैक्स लगाया है लेकिन अभी तक जिन कंपनियों का टर्नओवर 250 करोड़ रुपए था उन्हें 25 फीसदी टैक्स देना होता था। अब सरकार ने व्यापारियों को बड़ी राहत दी है और 400 करोड़ रुपए सालाना आय वाली कंपनियों को 25 फीसदी टैक्स देना होगा।

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युवाओं के लिए स्टार्ट अप की बात करें तो सरकार ने यहां भी ध्यान दिया है। स्टार्ट अप करने वालों को एंजल टैक्स से मुक्ति दे दी है। साथ ही शुरूआती तीन साल तक आयकर विभाग कोई दबाव नहीं बनाएगा।

महिलाओं का भी इस बजट में खास ध्यान रखा है। मुद्रा योजना के तहत महिलाओं को एक लाख रुपये तक का लोन दिया जाएगा। अब तक महिलाएं अपने जनधन खाते से सिर्फ 2 हजार रुपये ही निकाल सकती थीं, जिसे बढ़ाकर अब 5 हजार रुपये कर दिया गया है।

इन सब बिंदुओं पर नजर डाले तो आम आदमी को घर, गाड़ी और स्टार्ट अप के लिए सरकार ने बहुत कुछ दिया है। गरीबों से लेकर अमीरों तक की झोली में सरकार ने कुछ न कुछ डाला है। इन सब बिंदुओं को देखने के बाद कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने आम आदमी को सिर्फ 'धन्यवाद' ही नही दिया है।

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Wednesday, July 3, 2019

राहुल के इस्तीफे पर 'जय श्री राम'



सुरभि भावसार 

पहले पेशकश, फिर शर्तों के साथ पद पर बने रहता, फिर मनाने का दौर, फिर धरने की नौटंकी और आखिर में इस्तीफा। तमाम सम्झाईशें और गुजारिशे भी काम नहीं आई और आखिर में आज राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया है। ट्विटर पर 4 पन्नों की चिट्ठी लिखकर राहुल गांधी ने अपनी बात कही। वजह भी बताई, तरीका भी सुझाया और मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। 

राहुल गांधी ने चिट्ठी में अपने इस्तीफे की वजह भी बताई। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी को मिली करारी हार की जिम्मेदारी मेरी है। पार्टी के विकास के लिए जवाबदेही महत्वपूर्ण है, मैं हार की जिम्मेदारी लेता हूं और इसी कारण मैं अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं। हालांकि आगे उन्होंने लिखा कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहना मेरे लिए गर्व की बात है। 


पार्टी को सुझाव देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मैंने इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी को सुझाव दिया है कि वह कुछ लोगों यह जिम्मेदारी दें और वह एक नए अध्यक्ष का चुनाव करें। मैं इस काम में उनका पूरा सहयोग करूंगा। मेरा संघर्ष कभी बेकार नहीं जाएगा। भाजपा का मैंने हमेशा विरोध किया है और आखिरी दम तक भाजपा की विचारधारा का विरोध करता रहूंगा। मेरा यह विरोध निजी नहीं बल्कि भारत की विचारधारा के आधार पर है। मैं कांग्रेस का एक वफादार सैनिक हूं और भारत माता का सच्चा सपूत भी। ऐसे में देश को बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ता रहूंगा।

जब उनसे नए अध्यक्ष का नाम पूछा गया तो उन्होंने इससे भी इनकार कर दिया। राहुल ने लिखा कि उनके कुछ सहयोगियों का कहना है कि वे पार्टी के किसी ठीक नेता को आगे के नेतृत्व के लिए नामित करें लेकिन मेरे लिए इस हालत में अगले नेतृत्व का चयन करना सही नहीं होगा। हमारी पार्टी का इतिहास पुराना है। यह एक विचारधारा वाली पार्टी है और मैं उसका सम्मान करता हूं। ऐसे में मुझे पूरा विश्वास है कि पार्टी किसी एक अच्छे नेता का चुनाव करने में पूरी तरह से सक्षम है जो पार्टी को मजबूत नेतृत्व दे सकता है।

वहीं  राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पक्ष-विपक्ष की तमाम प्रतिक्रिया भी आपने लगी है। अमेठी में राहुल गांधी को मात देने वाली केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जब इस बारे में पूछा तो वह 'जय श्री राम' कहकर चली गईं। फिलहाल पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष मोतीलाल वोरा होंगे। 


राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पार्टी गांधी मुक्त तो गई है लेकिन अब सवाल ये भी उठ रहे है कि राहुल गांधी मैदान से भाग क्यों रहे हैं? अब पार्टी किसे यह जिम्मेदारी सौंपेगी? क्या नया अध्यक्ष पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह भर पाएगा? क्या पार्टी को फिर से खड़ा पाएगा? खैर इन तमाम सवालों के जवाब तो आगे ही मिल पाएंगे लेकिन पार्टी के नेता राहुल गांधी को नहीं मना सके। 


Monday, July 1, 2019

अमरनाथ यात्रा: सुरक्षा चाक-चौबंद, 26 साल में 14 हमले और 68 मौतें



'हर-हर महादेव' का नारा और आतंकियों का साया। पवित्र अमरनाथ यात्रा आज से शुरू हो गई है। एक जुलाई से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलने वाली इस यात्रा में सरकार के लिए सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान के साथ सख्त रूप अपनाए हुए और घाटी में आतंकियों के सफाए के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशन आलआउट के तहत सुरक्षाबलों ने अब तक 140 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया है।

पुलवामा में हुए बड़े आतंकी हमले और हाल ही में अनंतनाग में हुए आतंकी हमले के बाद अमरनाथ यात्रा पर खतरे के बादल और भी गहरे हो गए है। इसके अलावा राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने है, ऐसे में आतंकी किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते है। इसके अलावा ख़ुफ़िया इनपुट से बालटाल रूट पर आतंकियों को निशाना बनाने की आशंका मिली है। इन सब खतरों के बाद सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है।

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वैसे तो हर साल ही अमरनाथ यात्रा पर आतंकी साया मडराता है लेकिन इस बार आतंक के खिलाफ भारत के सख्त रूप को देखते हुए इस बार अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा कड़ी चुनौती बनी हुई है।

कब-कब अमरनाथ यात्रियों पर हुआ हमला-

1993 में आतंकियों ने पहली बार अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया था। इसके बाद सबसे ताजा हमला 2017 में अमरनाथ यात्रियों की बस को निशाना बनाया गया था। 1993 से अभी तक 26 सालों में अमरनाथ यात्रियों पर 14 हमले हो चुके है जिसमें 68 लोगों की जान गई है।

1993

1993 में हुई अमरनाथ यात्रा पर पहला आतंकी हमला हुआ था। इस साल हुए दो आतंकी हमलों में दो यात्रियों ने जान गंवा दी थी। यह यात्रा पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन हरकत उल अंसार और लश्कर ए तैय्यबा की धमकियों के बीच हुई थी।

1994

19 94 में हुई अमरनाथ यात्रा में भी आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया। इस हमले में दो यात्रियों की जान चली गई।

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1995

इस साल हुई अमरनाथ यात्रा पर तीसरा आतंकी हमला हुआ। इस दौरान तीन आतंकी हमले हुए। गनीमत ये रही कि किसी भी यात्री की जान नहीं गई।

1996

1996 में हुई अमरनाथ यात्रा के दौरान दो आतंकी हमले हुए। हालांकि इस दौरान सभी यात्री सुरक्षित रहे।

2000

2000 में हुई अमरनाथ यात्रा पर घात लगाए आतंकियों ने सबसे बड़ा हमला किया। 2 अगस्त 2000 को आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों के पहलगाम बेस कैंप में अंधाधुंध फायरिंग की। इस हमले में 32 श्रद्धालु, स्थानीय दुकानदार और पोर्टरों की जान गई। आतंकियों की इस खूनी साजिश में 60 लोग घायल भी हुए थे। अमरनाथ यात्रा पर हुआ आतंकी हमलों में यह सबसे बड़ा हमला था।

2001

सबसे बड़े आतंकी हमले के एक साल बाद फिर 20 जुलाई 2001 को आतंकियों ने पहलगाम बेस कैंप से आगे शेषनाग लेक के पास अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया। आतंकियों ने यात्रियों के कैंप पर हथगोले फेंके. जिसमें 12 लोगों की मौत हुई और 15 लोग घायल हुए थे।

2002

30 जुलाई 2002 को आतंकियों ने फिर अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाते हुए टैक्सी पर हमला कर दिया। आतंकियों ने श्रीनगर से अमरनाथ यात्रा के लिए जा रहे  श्रद्धालुओं की प्राइवेट टैक्सी पर हमला किया। इस हमले में दो यात्रियों की मौत हो गई और दो लोग घायल हुए। इसके बाद 6 अगस्त 2002 को आतंकियों ने पहलगाम के ननवान कैंप के पास ग्रेनेड फेंका और गोलीबारी की। इस आतंकी हमले में 9 लोगों की मौत और 27 लोग घायल हुए थे।

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2006

20०६ में आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों की बस पर ग्रेनेड फेंका। इस हमले में एक यात्री की मौत हो गई थी।

2017

करीब 11 साल तक शांति से हुई अमरनाथ यात्रा के बाद 10 जुलाई 2017 को आतंकी एक बार फिर अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाने में कामयाब हो गए। आतंकियों ने अनंतनाग में यात्रियों की बस पर अंधाधुंध फायरिंग की। आतंकियों के इस हमले में 7 यात्रियों की मौत हो गई और 32 लोग घायल हो गए।

हालांकि आतंकियों के खोइफ्नक मंसूबे इसलिए भी कामयाब हो गए थे क्योकि यात्रियों की ये बस सुरक्षाबलों के आधिकारिक काफिले का हिस्सा नहीं थी। सुरक्षाबलों ने इस हमले में शामिल आतंकी मॉड्यूल के खिलाफ कई ऑपरेशन चलाए और 60 दिन के अंदर पूरे आतंकी मॉड्यूल का सफाया कर दिया।

Monday, June 24, 2019

परिवारवाद की जद में 'माया'



सुरभि भावसार 

राजनीति में परिवारवाद का लंबे समय से विरोध करने वाली आज खुद परिवारवाद की जद में है। खुद को परिवारवाद से दूर बताने वाली बसपा की मुखिया मायावती की पार्टी में अब भाई-भतीजावाद नजर आने लगा है। मायावती के इस फैसले ने साफ़ कर दिया है कि अब बसपा में परिवारवाद का सीधा दखल होगा। 

रविवार को बड़ा फैसला लेते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को नेशनल को-आर्डीनेटर नियुक्त किया है। मायावती का यह फैसला तमाम सवालों को जन्म दे रहा है कि क्या अब तक परिवारवाद से दूर रही बसपा भी अब परिवारवाद की राजनीति करेगी? क्या बसपा को आगे बढ़ाने के लिए मायावती को कोई बाहर का सदस्य नहीं मिला? 


इतना ही नहीं बसपा को परिवारवाद का रंग देने वाले मायावती के इस फैसले ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम का भी अपमान किया है। कांशीराम ने बसपा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के किसी सदस्य को आगे नहीं किया और मायावती का नाम आगे बढ़ाया।  

चुनाव से पहले मायावती ने ये फैसला इसलिए नहीं लिया क्योकि उन्हें इस बात का डर था कि उनके उपर भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगेगा। 

मायावती के इस फैसले के पीछे गौर किया जाए तो एक कारण यह भी है कि वह पार्टी के जरुरी मसलों पर बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं कर सकती। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए भी वह किसी बाहरी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहती। इसका भी कारण है कि उन्होंने राजनीती में जिस भी करीबी व्यक्ति पर भरोसा किया उसने विपक्ष का दामन थाम लिया। 


इतिहास पर नजर डाले तो स्वामी प्रसाद मौर्या एक समय मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते थे लेकिन उन्होंने हाथी का साथ छोड़ भगवा गमछा ओढ़ लिया। इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकीभी मायावती का साथ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए। 

इसके अलावा एक अहम् कारण है मायावती की बढती उम्र। 60 साल की उम्र पार कर चुकी मायावती को अब विरासत की भी चिंता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि बसपा में उनका उत्तराधिकारी कोई दलित या मुस्लिम ही हो सकता है लेकिन भाई और भतीजे को अहम् जिम्मेदारी देने के बाद क्या ये मां लिया जाए कि मायावती ने नया चेहरा खोज लिया है जिस पर वह भरोसा कर सके? 

Thursday, June 20, 2019

फिर ट्रोल हुए राहुल गांधी, राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान की ये हरकत



कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी किसी न किसी हरकत को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल होते रहते है। कई बार वह अपने भाषण के दौरान कुछ ऐसा बोल जाते है जिससे वह सोशल मीडिया पर छा जाते है या फिर कभी सबके बीच कुछ ऐसा कर जाते है कि कैमरे में कैद हो जाता है। 

हल ही में राहुल गांधी का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह संसद में मोबाइल चला रहे है। वीडियो उस समय का है जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद संसद में सरकार के अगले पांच साल का प्लान बता रहे थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी मोबाइल में देखते नजर आए। एक घंटे से ज्यादा के राष्ट्रपति के अभिभाषण में पहले 24 मिनट तक राहुल अपने मोबाइल में व्यस्त रहे। 

24 मिनट मोबाइल में व्यस्त रहने के बाद अगले 20 मिनट वह बगल में बैठीं सोनिया गांधी से कुछ बातचीत करते रहे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान एक भी बार राहुल गांधी ने मेज नहीं थपथपाई। सिर्फ आखिर में एक सेकेंड के लिए मेज को छुआ। वहीं सोनिया गांधी ने लगभग 6 बार मेज थपथपाई। 


https://twitter.com/knowthenation/status/1141593072410619904
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राष्ट्रपति ने जब उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक का जिक्र किया तो सांसदों ने लंबे समय तक मेज थपथपाई लेकिन राहुल नीचे देखते हुए शांत बैठे रहे।  

अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी तस्वीरें खींचने में व्यस्त रहे। बीच में सोनिया गांधी और राहुल गांधी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीर को देखकर कुछ चर्चा करते भी दिखे। इतना ही नहीं राहुल गांधी मंच की तस्वीरें खींचकर सोनिया गांधी को दिखाते नजर आए। 

राहुल गांधी के संसद से जाने तक कैमरों की नजर उनपर ही रही। भाषण ख़त्म होने के बाद राहुल गांधी वहां से जाने लगे तब सोनिया गांधी ने उन्हें इशारा किया कि राष्ट्रपति अभिनंदन करने के लिए आ रहे हैं। इसके बाद राहुल गांधी वहां रुके और महामहिम से हाथ मिलाया।  


Friday, June 14, 2019

मोदी को मिला दुनिया का साथ, अब होगा आतंक का विनाश?



सुरभि भावसार 

मंच कोई भी हो भारत अब आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सख्त रवैया यही बता रहा है कि भारत अब और आतंकवाद नहीं सहेगा। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हमेशा आतंकवाद का मुद्दा उठाने वाले भारत ने अब इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की मांग करते हुए आतंक को पनाह देने वाले देश को जिम्मेदार ठहराने की मांग की है।

साफ़-साफ़ देखा जाए तो एससीओ सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बिना नाम लिए सीधे पाकिस्तान पर प्रहार किया। प्रचंड जीत के बाद दुनिया जीतने निकले मोदी को दुनिया ने गले लगाया लेकिन पाकिस्तान के इमरान खान को हमेशा ही बैकफुट पर ही रहना पड़ा।

इस बैठक में मोदी और इमरान खान आमने-सामने आए लेकिन कोई बात हुई और ना ही कोई मुलाक़ात। इतना ही नहीं मोदी यहां दुनिया के सभी नेताओं के स्वागत में खड़े हुए और हाथ भी मिलाया लेकिन इमरान खान को संदेश दे दिया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत सख्त रवैया अपनाए हुए है। पाकिस्तान जब तक आतंकवाद के खिलाफ कदम नहीं उठाएगा भारत बातचीत नहीं करेगा। 

खास बात तो ये है कि बैठक के उद्घाटन समारोह में मोदी और इमरान खान एकसाथ हॉल में पहुंचे लेकिन इस दौरान मोदी ने इमरान खान से हाथ मिलाना तो दूर उनकी ओर देखा तक नहीं। इसके अलावा मोदी ने पाकिस्तान द्वारा खोले गए एयरस्पेस का भी इस्तेमाल नहीं किया। वह ओमान के रास्ते बिश्केक पहुंचे है।

आतंकवाद के खिलाफ मोदी को दुनिया का साथ भी मिल गया है। SCO 2019 के घोषणापत्र में क्रॉस बॉर्डर आतंकवाद अहम् मुद्दा बना है। पाकिस्तान के खिलाफ पीएम मोदी का ये सख्त रवैया यही बता रहा है कि अब भारत और आतंकवाद नहीं सहेगा। भारत आतंकवाद मुक्त समाज बनाने का पक्षधर है। अब सवाल ये है कि क्या पूरी दुनिया मिलकर आतंक को हरा पाएगी? क्या मोदी की कूटनीति के आगे पाकिस्तान झुकेगा?

Thursday, June 13, 2019

ख़ूनी राजनीति से बंगाल का पुराना नाता



पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों लाल रंग से रंगी नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव में ममता के गढ़ में सेंध लगाने के बाद बीजेपी और टीएमसी के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा का ये कोई पहला मामला नहीं है। राज्य में राजनीतिक हिंसा का इतिहास 150 साल पुराना है। ब्रिटिश काल के किसान आंदोलन से लेकर आजादी के बाद तेभागा आंदोलन, नक्सल आंदोलन, माओ आंदोलन के तहत जल, जंगल और जमीन का नारा वहां लोकप्रिय हुआ। लोकसभा चुनाव 2019 के चुनावों से हो रही हिंसा से बंगाल की हिंसा की संस्कृति को फिर ताजा कर दिया। 


1960 के दशक का चुनावी हथियार

बंगाल में रानीतिक हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। 1960 के दशक में राजनीतिक हिंसा बंगाल में चुनावी हथियार रहे है। वहां पर सत्ताधारी दल अपना बर्चस्व बनाए रखने के लिए हमेशा से शासन और प्रशासन का इस्तेमाल करते आए है। बंगाल में दशकों से जारी राजनीतिक हिंसा के तीन मुख्य कारण है- बढ़ती बेरोजगारी, विधि शासन पर सत्ताधारी दल का बर्चस्व। 

लेफ्ट फ्रंट के राज में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं 

पश्चिम बंगाल में 1977 से 2007 तक लेफ्ट फ्रंट ने राज किया। 30 साल तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार के सत्ता में रहने के दौरान 28 हजारराजनीतिक हत्याएं हुई। सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी वाम हिंसा का एक नमूना माना जाता है। इसके अलावा भी ढेरों घटनाएं ऐसी हैं जो कभी दर्ज ही नहीं हुईं।


2014 में 14 हत्याएं

लोकसभा चुनाव 2014 के विभिन्न चरणों के दौरान राज्य में 15 राजनीतिक हत्याएं हुईं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से मई 2014 के काल में पश्चिम बंगाल में 23 से ज्यादा राजनीतिक हत्याएं वहां पर हुईं।

 पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं

2018 में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई। व्यापक हिंसा को लेकर भाजपा ने दावा किया था कि चुनाव के दौरान पार्टी के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या टीएमसी ने कराई जबकि टीएमसी ने दावा किया था कि उसके 14 कार्यकर्ता मारे गए थे। 


2019 लोकसभा चुनाव में हिंसा

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। सात चरणों में हुए इन चुनावों के हर चरण में बंगाल में हिंसा हुई। हर चरण में हुई हिंसा के बावजूद बंगाल में बंपर वोटिंग हुई। 

11 अप्रैल को हुए पहले चरण में 83.80 प्रतिशत मतदान हुआ। इस दौरान अलीपुरदुआर और कूच बिहार पर टीएमसी और भाजपा समर्थकों में हिंसा हुई। कई बूथों पर मतदान धीमा रहा. टीएमसी समर्थकों ने लेफ्ट फ्रंट प्रत्याशी गोविंदा राय पर हमला किया, उनकी गाड़ी तोड़ी। 

दूसरे चरण के चुनाव में 81.72 फीसदी मतदान हुआ। रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई-एम सांसद मो. सलीम की कार पर टीएमसी समर्थकों पत्थरों और डंडों से हमला किया। 


तीसरे चरण में 81.97 फीसदी मतदान हुआ। हिंसा की 1500 शिकायत चुनाव आयोग को मिली। बूथों पर बमबाजी हुई. सीपीएम समर्थकों पर हमला। मुर्शिदाबाद में 56 वर्षीय कथित कांग्रेस समर्थक की टीएमसी समर्थकों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। कोलकाता में 60 लोग गिरफ्तार हुए। 

चौथे चरण में 82.84 फीसदी मतदान हुआ। आसनसोल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों में जमकर झड़प। कुछ टीएमसी कार्यकर्ताओं ने सांसद बाबुल सुप्रियो की कार का शीशा तोड़ दिया। 

पांचवें चरण में बैरकपुर में भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पें हुई। भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमला करने का आरोप लगाया।

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में केवल 2 सीटें मिली थी लेकिन पांच साल में भाजपा ने यहां अपना संगठन मजबूत किया और 2019 के चुनाव में 18 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया। इसका नतीजा है कि भाजपा राज्य में चौथे नंबर से दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है।

Friday, June 7, 2019

फिर हैवानियत, फिर गिरफ्तारी, फिर आश्वासन लेकिन कब तक...




सुरभि भावसार

जिस आंगन में वह नन्ही चिड़ियां चहचहाती थी, वहां अब मातम, गम और आंसू है। जहां वह बच्ची खेलती थी आज वह आंगन सुना पड़ा है। आज यह कहना पड़ रहा है कि बेटी हम शर्मिंदा है, तेरे कातिल अभी जिंदा है। हम कैसे समाज में रह रहे है, जहां आपसी रंजिश के चलते ढाई साल की मासूम की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है और सबूत छिपाने के लिए उसका शव कूड़े के ढेर में फेक दिया जाता है। 

मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का है। यहां आपसी रंजिश के कारण ढाई साल की बच्ची की बेरहमी से हत्या कर दी गई। 30 मई को बच्ची घर से गायब हो गई। रातभर जब उसका पता नहीं लगा तो परिजनों ने 31 मई को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस को जिस मामले में जी-जान से जुट जाना चाहिए था, उसमे वह हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही। 


दो दिन बाद 2 जून को उसी बच्ची का शव कूड़े के ढेर में मिलता है। शव जिस हालत में मिला है उसे देखकर किसी भी रूह कांप सकती है। बच्ची की आंखें निकली हुई थी, उसका हाथ कटा हुआ था। आशंका जताई जा रही थी कि हत्या से पहले बच्ची के साथ रेप हुआ है लेकिन पुलिस मामला बढ़ते देख कह दिया कि बच्ची के साथ रेप नहीं हुआ है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि बच्ची का शव इस हालत में ही नहीं था कि बलात्कार जैसी हैवानियत की जांच की जा सके। बच्ची का शव गल चुका था। 

इस घटना ने फिर देश को झकझोर कर रख दिया है। एक बार फिर लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतर गए और नेताओं ने दुख जताते हुए ट्वीट कर दिए। बॉलीवुड ने फिर सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा दिखा दिया। फिर एक बार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया। आखिर कब तक ये सब होता रहेगा। क्यों सरकार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती। योगी आदित्यनाथ के आने के बाद कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश रातोरात बदल जाएगा लेकिन कुछ नहीं हुआ। 


पिछले एक साल में  3704 बलात्कार हुए है। बलात्कार का ये आंकड़ा उस देश का है जहां लोग खुद को सभ्य कहते है। वोट कमाने के लिए नेता बहन-बेटियों की सुरक्षा पर बड़ी-बड़ी बातें करते है लेकिन वोट मिलते ही सब भूल जाते है। 

आखिर कब तक हमारे देश में ये सब चलता रहेगा। कब तक लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतरते रहेंगे और न्याय मांगते रहेंगे। जिस तरह मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार होने पर सजा-ए-मौत का कानून लागू किया है, उसी को यदि सभी राज्य सरकारें लागू करें और उसका कठोरता से पालन किया जाए तो ऐसे मामलो पर लगाम लग सकती है। 



Thursday, June 6, 2019

पीएम मोदी के साथ चाय पीने का मौका, जल्द करें ये काम



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हर कोई मिलना चाहता है। वह जहां भी जाते है उनकी एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती है। क्या गली, क्या रोड और क्या बालकनी उनको देखने के लिए हर जगह लोग जमा हो जाते है। इसी बीच आप एक मौके का फायदा उठाकर पीएम मोदी के साथ बैठकर चाय पी सकते हैं। 


दरअसल, मोदी सरकार इनकम टैक्स देने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए एक योजना लेकर आई है।, जिसके तहत सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने वाले लोगों को प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री के साथ चाय पीने का मौका मिलेगा।  

सरकार की इस योजना का मकसद इनकम टैक्स कलेक्शन बढ़ाना है। कहा जा रहा है कि इस बारे में सरकार पहले बजट में कोई ऐलान कर सकती है। अभी तक टैक्स डिपार्टमेंट सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने वाले लोगों को एप्रिसिएशन सर्टिफिकेट देता आ रहा है लेकिन अब उन्हें और ज्यादा प्रोत्साहित करने के लिए पीएम के साथ चाय पीने का मौका दे रहा है। 


ऐसे आया आईडिया 

सरकार को ये आईडिया तब आया जब 31 मार्च को फाइनेंशियल इयर ख़त्म होने में डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन सरकार के रिवाइज्ड टारगेट से भी कम रहा। सरकार ने 12 लाख करोड़ रुपये टैक्स कलेक्शन किया था। इसके बाद सरकार ने टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए यह योजना बनाई है। 

Tuesday, June 4, 2019

और फिर चल दिए तुम कहां, हम कहां



सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिए चुनावी सफ़र में साथ आए बुआ-बबुआ की राहें अब अलग होती दिख रही है। सफलता नहीं मिलने पर बुआ ने साथ छोड़ने के संकेत दिए तो बबुआ भी पीछे नहीं रहे और थोड़ी देर बाद कह दिया किअगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। अब गठबंधन की ये डोर टूटती नजर आ रही है। मायावती के इस रुख के बाद कहा जा रहा है कि क्या मायावती ने सपा से पुराना बदला लिया है? ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योकि मुलायम सिंह ने इस गठबंधन का विरोध किया था। 

दरअसल, मायावती द्वारा हार का ठीकरा अखिलेश पर फोड़ने के बाद से ही गठबंधन में दरार की अटकले लगाई जा रही थी, जिसपर मंगलवार को मायावती ने विराम लगा दिया। मायावती ने हार का ठीकरा अखिलेश यादव पर फोड़ते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव पर बीएसपी अकेले लड़ेगी। हालांकि दो टूक में मायावती ने यह भी कहा कि सपा प्रमुखअपने राजनीतिक कार्यों को करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को मिशनरी बनाते हैं तो फिर हम आगे साथ लड़ेगे। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो हमें अकेले ही चुनाव लड़ना होगा।


अखिलेश यादव भी बिना देर किए मीडिया के सामने आए और कहा कि गठबंधन के बारे में सोचकर विचार करेंगे, अगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। आगे उन्होंने कहा कि यदि उपचुनाव में अकेले लड़ने का फैसला हुआ है तो हम भी उपचुनाव अकेले लड़ने की तैयारी करेंगे। 

बसपा को मिला फायदा

दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए हाथी ने साइकिल की सवारी तो कर ली लेकिन वहां तक नहीं पहुंच पाए और अब साइकिल पंचर होती दिख रही है। नतीजों पर गौर किया जाए तो एसपी-बीएसपी गठबंधन का पूरा फायदा बसपा को ही मिला है। चुनाव में सपा शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गई वहीं सपा पांच सीटें ही जीत पाई है। 


मायावती रही सीनियर

सपा-बसपा गठबंधन पर ध्यान दिया जाए तो इस पूरे गठबंधन में मायावती सीनियर और अखिलेश जूनियर की भूमिका में रहे। इतना ही नहीं मायावती हमेशा अपनी शर्त रखती रही और अखिलेश उस शर्त को मानते रहे। शायद यही वजह है कि मायावती को शर्त की राजनीति करने के लिए जाना जाता है। 

मायावती ने अपने कोटे से आरएलडी को सीट देने से मना कर दिया था, जिसके बाद अखिलेश ने अपने कोटे से मथुरा सीट आरएलडी को दे दी। इसके अलावा सीट बंटवारे में भी मायावती ने सभी शहरी सीटें समाजवादी पार्टी के कोटे में दे दी। इनमे से 10 सीट ऐसी थी जहां भाजपा को हराना नामुमकिन था। 


उपचुनाव तय करेंगे सपा-बसपा की स्थिति

उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव सपा-बसपा अलग-अलग लड़ेगी। यही चुनाव 2022 की तस्वीर तय करेंगे और गठबंधन टूटने के बाद सपा-बसपा की स्थिति साफ़ करेंगे। भाजपा के लिए भी ये चुनाव इसलिए अहम् है क्योकि ये चुनाव मोदी के नाम पर नहीं होंगे। 

इसके अलावा एक सवाल ये भी उठ रहा है कि मायावती ने गठबंधन क्यों तोड़ा? क्या सच में चुनाव में सफलता नहीं मिलना इसका कारण है या फिर कुछ और? तो इसको लेकर कहा जा रहा है कि मायावती ने पहली बार उपचुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में कहा जा रहा है कि मायावती की नजर 2022 में सीएम की कुर्सी पर है। यदि उपचुनाव में गठबंधन लड़ता तो सीएम पद का उम्मीदवार अखिलेश यादव को बनाना पड़ता।

Monday, June 3, 2019

सादगी की मिसाल 'दीदी', आज भी चाय और मुरमुरे से करतीं हैं मेहमानों का स्वागत



साल 2011 से बंगाल की सत्ता संभाल रही ममता बनर्जी जितनी गुस्से वाली है उतनी ही नर्म दिल और सादगी से भरी हुई है। मुख्यमंत्री के पद पर रहने के बाद भी जितनी सादगी से वह रहती है उसका हर कोई कायल है। सफ़ेद साड़ी और स्लीपर पहनने वाली ममता संघर्ष भरे दिनों से जूझकर सत्ता तक पहुंची है। भले ही आज वह देश के बड़े राज्य की मुख्यमंत्री है लेकिन मेहमानों का स्वागत सादगी के साथ मुरमुरे और पानी से ही करती हैं।


5 जनवरी 1955 में कोलकाता में जन्मी ममता बनर्जी सादगी भरा जीवन जीने के लिए जानी जाती हैं। राजनीति में उनकी छवि तेज तर्रार और आक्रामक अंदाज वाले नेता की है। ममता ने कोलकामा विश्वविद्यालय से इस्‍लामिक इतिहास में एमए की डिग्री प्राप्त की है। साथ ही वह वकालत की पढ़ाई भी कर चुकी हैं। राजनीति के क्षेत्र में तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन क्या आप जानते है कि वह हमेशा सफ़ेद साड़ी ही क्यों पहनती है। शायद नहीं तो हम आपको बताते है इसके पीछे का कारण।

हमने ममता बनर्जी को जहां भी देखा है हमेशा सफ़ेद रंग की साड़ी पहने ही देखा है। दरअसल, ममता को सादा जीवन जीना ही पसंद है। जब वह 9 साल की थी तभी उनके पिता का निधन हो गया था। उनका परिवार गरीबी से झूझने लगा और इस वजह से उन्हें कपड़े खरीदने का भी शौक नहीं रहा। आज उन्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं है लेकिन आज भी वह अपने घर आए मेहमानों का स्वागत मुरमुरे और पानी से हीं किया करतीं हैं।


दीदी का राजनीतिक सफ़र-

दीदी के नाम से जानी जाने वाली ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र 1970 में शुरू हुआ, जब वह कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता बनीं। 1976 से 1980 तक वह महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। 1984 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराकर सबसे युवा सांसद बनीं।

ममता दो बार रेल मंत्री भी रह चुकी है। इसके अलावा वह केंद्र सरकार में कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल के साथ ही महिला व बाल विकास की राज्य मंत्री भी रह चुकी हैं। 2011 में उन्‍होंने पश्‍चि‍म बंगाल में वामपंथी मोर्चे का सफाया किया और राज्य की मुख्यमंत्री बनीं।


Sunday, June 2, 2019

बीजेपी की इस बड़ी नेता का कैसा विश्वास, दिन के हिसाब से पहनती है साड़ी



भारतीय संस्कृति को समेटे हुए माथे पर लाल बिंदी, मांग में सिंधूर, चौड़े पट्टे के बॉर्डर वाली साड़ी उनकी पहचान बन चुकी है। बुधवार है तो तय है कि भाजपा की यह वरिष्ठ मंत्री हरे रंग की साड़ी में ही नजर आएंगी। जी हां, हम बात कर रहे है पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की। वह जहां भी जाती है भारतीय संस्कृति को साथ लेकर जाती है और यही कारण है कि विदेशों में भी उनकी खूब तारीफ़ होती है। चौड़े पट्टे की साड़ी पर स्टाइलिश जैकेट उनकी पहचान बन गया है। वह देश की लोकप्रिय नेताओं में से एक मानी जाती है।

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आज हम आपको उनसे जुडी एक ख़ास बात बताने जा रहे है. जो शायद आपने कभी नहीं सुनी होगी। सुषमा स्वराज एक धार्मिक महिला हैं, वह हर त्यौहार को पारंपरिक तरीके से मनाती हैं। कहा जाता है कि वह पहनावे से लेकर खाने तक का चयन दिन के हिसाब से करती हैं। हफ्ते के सातों दिन अलग-अलग रंग की साड़ियां पहनती है।

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इस बात का खुलासा उस समय हुआ जब कुछ सालों पहले पाकिस्तान दौरे के दौरान हरे रंग कि साड़ी पहनी थी। इसको लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने कई तरह के सवाल खड़े किए थे, तब उन्होंने बताया था की वह दिन के हिसाब से साड़ी पहनती है। बुधवार को वह हरी साड़ी पहनती है और उस दिन बुधवार ही था।

Saturday, June 1, 2019

क्रिकेट खेलने के शौकीन शाह क्या कर पाएंगे 'धारा 370' को आउट?



सुरभि भावसार

मोदी सरकार में नंबर 2 के नेता अमित शाह के सामने अब गृह मंत्री बनने के बाद देश के अंदरुनी मामलों से निपटने की चुनौतियां होगी। शाह को जम्मू-कश्मीर, नक्सलवाद, आतंकवाद, पश्चिम बंगाल में बढ़ते बांग्लादेशियों की संख्या और सीमा पर पड़ोसी देश की नापाक हरकतों पर लगाम लगाने के लिए कमर कसनी होगी। गुजरात सरकार में लगातार नौं साल तक गृह मंत्री का पद संभालने वाले अमित शाह देश को तोड़ने वाली नब्जों को आसानी से दबोच सकते है। वैसे भी गुजरात दंगों के बाद अमित शाह ने गृह मंत्री रहते हुए अप्रिय घटनाओं पर ऐसा अंकुश लगाया कि कोई बड़ा मामला वहां से आज तक निकलकर सामने नहीं आया।


धारा 370

जम्मू-कश्मीर में साल के अंत में चुनाव हो सकते है। ऐसे में हमेशा से भाजपा का एजेंडा धारा 370 को खत्म करना और अनुच्छेद 35 ए को निरस्त करने का रहा है, जिसपर गृह मंत्रालय का रुख राज्य की सियासत में काफी उतार-चढ़ाव लाने वाला साबित हो सकता है। अमित शाह के सामने इन मामलों से निपटना एक बड़ी चुनौती होगी। अब देखना ये होगा कि क्या शाह धारा 370 को आउट कर पाएंगे?

पश्चिम बंगाल

इसके अलावा पश्चिम बंगाल की सियासी स्थिति को लेकर भी देश की निगाहें अमित शाह पर टिकी हुई है। गौरतलब है कि बंगाल में दीदी की कानून व्यवस्था और राज्य से हिंसा की खबर आती रहती है। बंगाल में भाजपा और टीएमसी के बीच चल रहे तनाव के बीच यह देखना भी काफी दिलचस्प होगा कि बतौर गृह मंत्री अमित शाह और दीदी के बीच कानून व्यवस्था और दूसरे मामलों में संबंध कैसे होंगे।


नक्सलवाद

इन दिनों नक्सली हमलों की संख्या भी बढ़ी है। कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो नक्सली हिंसा में कमी आई है। आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में माओवादी कमजोर पड़े हैं, लेकिन छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और बिहार में हमले तेज हो गए है। ऐसे में अमित शाह के सामने नक्सलवाद को पूरी तरह से कुचलना एक बड़ी चुनौती है।

आतंकवाद

अमित शाह हमेश कहते रहे है कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी और उनकी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति हमेशा रहेगी। ऐसे में अब घाटी को आतंक मुक्त करने की जिम्मेदारी अमित शाह के कंधो पर है। सीमा पार से बढ़ रही आतंकी घटनाओं पर काबू पाना अब गृह मंत्री के सामने बड़ी चुनौती है।

एनआरसी 

भाजपा पूर्वोत्तर में लगातार पैर पसारने की कोशिश कर रही है। कयास लगाए जा रहे है कि गृह मंत्रालय की प्राथमिकता पूर्वोत्तर भी हो सकता है। ऐसे में अमित शाह के सामने एक चुनौती एनारसी को लागू करवाने की भी है।


असम में एनआरसी को लेकर भी विवाद बढ़ा है। कोई भी वाजिब भारतीय नागरिक एनआरसी से बाहर न रह जाए, यह सुनिश्चित करना नए  गृह मंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती है। अमित शाह कहते रहे है कि देश में अवैध रुप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकाल बाहर करेंगे। अब देखन यह है कि शाह इस चुनौती का सामना कैसे करते है।

ये सभी जानते है कि असम सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में एनआरसी का जमकर विरोध हो रहा है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध करने में मुखर रही हैं। ऐसे में यदि अमित शाह इसे लागू करते है कि ममता सरकार के साथ उनका टकराव और भी बढ़ सकता है।






Friday, May 31, 2019

सेल्स गर्ल का काम करती थीं यह मंत्री, आज हाथों में है देश के खजाने की चाबी




मोदी कैबिनेट में हुए मंत्रियों के कामकाज के बंटवारे में रक्षामंत्री रही निर्मला सीतारमण को एक बार फिर अहम् जिम्मेदारी मिल गई है। देश के इतिहास में दूसरी माहिला रक्षामंत्री रही निर्मला सीतारमण अब देश की पहली महिला वित्त मंत्री बन गई है। अपने पहले ही कार्यकाल में निर्मला काफी एक्टिव रहीं और राफेल के मुद्दे पर संसद में और बाहर सरकार का पक्ष रखा।

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सेल्स गर्ल का करतीं थीं काम

तमिलनाडु के साधारण परिवार में 18 अगस्त 1959 को जन्मी निर्मला सीतारमण का जीवन काफी संघर्ष भरा रहा। उनके पिता रेलवे में काम करते थे और मां घर संभालती थी। पिता का बार-बार ट्रांसफर होने के कारण उन्हें तमिलनाडु के कई हिस्सों में रहना पड़ा। किसी समय सीतारमण ने सेल्स गर्ल के तौर पर भी काम किया।

JNU से की पढ़ाई

निर्मला सीतारमण की शुरुआती पढ़ाई तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुई। मास्टर डिग्री उन्होंने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से ली। इसके बाद उन्होंने इंडो-यूरोपियन टेक्सटाइल ट्रेड में पीएचडी की रिसर्च की।

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लंदन में थीं सेल्स गर्ल

निर्मला सीतारमण ने पढ़ाई के दौरान कई जगह काम करने के साथ ही शादी के बाद भी काम किया। शादी के बाद जब वह लंदन में रहती थीं तो वहां उन्होंने घर के सजावटी सामान बेचने वाली दुकान में सेल्स गर्ल का काम किया था।

इसके बाद वह लंदन में कृषि इंजिनियर्स असोसिएशन से जुड़ीं। फिर उन्होंने लंदन में ही प्राइस वॉटरहाउस नाम की कंपनी में सीनियर मैनेजर के तौर पर काम किया। वापस भारत आने पर उन्होंने हैदराबाद में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में डेप्युटी डायरेक्टर के रूप में काम किया।

2008 में ज्वाइन की भाजपा

साल 2008 में सीतारमण ने भाजपा ज्वाइन की और दो साल बाद ही पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनीं। 2014 में पूर्ण बहुमत से आई मोदी सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का पद सौंपा। इसके बाद 3 दिसंबर 2017 को उन्हें रक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंप दिया गया।

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बना लिया रिकॉर्ड

रक्षा मंत्री बनते ही निर्मला सीतारमण ने एक रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। वह देश की दूसरी महिला रक्षा मंत्री बनी थी। उनसे पहले सिर्फ इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार में इस मंत्रालय का जिम्मा लिया था।




Thursday, May 30, 2019

बचपन में मरने के लिए छोड़ दी गई थीं, आज बुलंदियों के शिखर को छू रही स्मृति ईरानी




आज यानी 30 मई को नरेंद्र मोदी की दूसरी बार ताजपोशी होने वाली है। मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में करीब 8 हजार मेहमानों के साथ ही फिल्म जगत की कई हस्तियां भी शामिल होंगी। राष्ट्रपति भवन में होने वाले शपथ ग्रहण में मोदी के साथ कई मंत्री भी शपथ लेंगे। इन मंत्रियों में एक नाम स्मृति ईरानी का भी है, जो इस बार कांग्रेस के गढ़ में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को हराकर लोकसभा पहुंचीं है।

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कभी रेस्टोरेंट में सफाई करने को मजबूर थी स्मृति

मॉडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली स्मृति ईरानी ने 1998 में मिस इंडिया प्रतियोगिता में हिस्सा लिया लेकिन फाइनल तक नहीं पहुंच पाई। इसके बाद स्मृति ने मुंबई जाकर एक्टिंग में करियर बनाने की कोशिश की। यहां उन्हें काम नहीं मिला और अपना खर्च चलाने के लिए उन्हें एक रेस्टोरेंट में सफाई का काम तक करना पड़ा।

मैकडॉनल्ड में किया वेटर का काम

स्मृति ईरानी अज जिन बुलंदियों पर पहुंचीं है उसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। एक जमाने में पेट भरने के लिए स्मृति ने मैकडॉनल्ड में वेटर का काम किया। स्मृति को य बुलंदियां नसीब से नहीं बल्कि अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर मिली है।

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मरने के लिए बिना कपड़े जमीन पर लिटा दिया था

दिल्ली में जन्मी स्मृति ईरानी एक मध्यमवर्गीय परिवार से थीं। रूढ़िवादी पंजाबी-बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाली स्मृति ने परिवार की बंदिशों को तोड़कर ग्लैमर की दुनिया में कदम रखा था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि बेटी पैदा करने की वजह से उनकी मां को ताने दिए जाते थे। बचपन में वो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं।

इस हालत में परिवार की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें बिना कपड़ों के जमीन पर लिटा दिया था, ताकि वो मर जाएं। जब मां ने इसका विरोध किया तो उन्हें कहा गया कि बेटी है मर जाएगी तो तुम्हारी जिंदगी आसान होगी। हालांकि मां-बाप के प्रगतिशील होने की वजह से उन्हें बचाया गया और वो जिंदगी में आगे बढ़ पाईं। 

Tuesday, May 28, 2019

कांग्रेस का सियासी संकट



सुरभि भावसार 

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में उथल-पुथल चल रही है। हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की थी लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इसे नामंजूर कर दिया है। हालांकि राहुल गांधी अभी भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। अभी ये तो नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी के इस्तीफा देने से पार्टी कमजोर हो जाएगी या नया अध्यक्ष मिलने से मजबूत होगी लेकिन ये बात भी सभी जानते है कि 2014  में हर कोई कांग्रेस छोड़ने को तैयार था, उस समय राहुल ने अकेले के दम पर ही कांग्रेस को उभारा था। इसके अलावा राहुल गांधी के ही नेतृत्व में पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मात देने में सफल हो पाई है।

राहुल गांधी के इस फैसले के बाद उन्हें पार्टी के कई नेता मनाने पहुंचे लेकिन वह नहीं माने। जब पार्टी अध्यक्ष पद के लिए प्रियंका गांधी का नाम आया तो राहुल ने इससे भी मना कर दिया और कहा कि पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का होना चाहिए। प्रियंका को इन सबमे नहीं खींचे।

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सूत्रों की माने तो राहुल गांधी ने पार्टी आलाकमान को एक महीने का वक्त दे दिया और कहा कि एक महीने में नया अध्यक्ष खोज लें। हालांकि राहुल गांधी ने यह भी कहा है कि वह  लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करने को तैयार हैं और पार्टी में अन्य भूमिका में काम करते रहेंगे लेकिन अध्यक्ष पद पर नहीं रहना चाहते।

पार्टी में चल रहे इस सियासी संकट में पार्टी आलाकमान के सामने नया अध्यक्ष खोजना एक नई चुनौती बन गई है। अब देखना ये होगा कि आलाकमान नया अध्यक्ष खोजती है या राहुल गांधी को मनाने में कामयाब होती है।

must read: मां तो आखिर मां होती है

एक बात ये भी है कि राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर जो कुछ भी चल रहा है उसे अब लोग नौटंकी बताने लगे है। लोगों का कहना है कि राहुल गांधी को इस्तीफा देना है तो दे दें, ये बेवजह का दिखावा क्यों कर रहे है। वैसे भी इस्तीफा उन्हें ही देना है और स्वीकार भी खुद ही करना है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अब किसी की कोई रुचि नहीं है कि राहुल गांधी अध्यक्ष के पद पर है या नहीं।

हिंदुत्व को ओढ़ने की कोशिश और खुद को शिवभक्त बताने में पार्टी पहले ही अपना नुक्सान करवा चुकी है। अब राहुल के इस्तीफे का दिखावा पार्टी को नुक्सान के सिवा और कुछ नहीं देगा। कांग्रेस ये क्यों नहीं समझ पा रही है कि उनके झूठे खेल से लोगों का मन भर चुका है।

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Monday, May 27, 2019

हार को अवसर में बदलेगी कांग्रेस?



सुरभि भावसार

2019 के लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता में लौट रही है। वहीं कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। अब पार्टी इस हार को एक बड़े अवसर के रूप में लेकर आगे बढ़ना चाहती है। खबर है कि कांग्रेस पार्टी बड़े फेरबदल की तैयारी में है, जिसके जरिए पार्टी लोगों के बीच यह संदेश देना चाहती है कि पुरानी पार्टी भी समय-समय पर बड़े बदलाव कर सकती है।

 हाल ही में पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि पार्टी ने इस हार की सामूहिक जिम्मेदारी ली है। अब आगे क्या किया जा सकता है और पार्टी के सामने क्या चुनौतियां होगी इस पर पार्टी मंथन कर रही है। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति एक ऐसा लोकतांत्रिक मंच है जहां विचार लिए और दिए जाते हैं, नीतियां बनाई जाती है और सुधार के लिए कार्रवाई की जाती है।

पार्टी चुनाव में मिली हार को एक बड़े अवसर के रूप में देख रही हैं ताकि पार्टी के संगठन स्तर पर बड़े बदलाव किए जा सके। इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पार्टी ने अधिकृत किया है। राजनीतिक गलियारों से जो खबर आई है उसमें यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के इस फेरबदल में बहुत से महासचिवों और राज्य इकाई प्रमुख पर गाज गिर सकती है।

must read: कांग्रेस का सियासी संकट

वहीं पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश भी की थी जिसे नामंजूर कर दिया गया। साथ ही  राहुल गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में  कुछ नेताओं द्वारा उनके बेटों को चुनाव मैदान में उतारे जाने को लेकर नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अपने बेटों के हितों को पार्टी के हितों से आगे रखा।

वैसे देखा जाए तो कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी की महासचिव बनाई गई प्रियंका गांधी का पद भी खतरे में पड़ सकता है क्योकि प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया था, जहां कांग्रेस केवल एक ही सीट जीत पाई है। अब देखना तो यह होगा कि कांग्रेस इस हार को बड़े अवसर के रूप में लेकर पार्टी में कोई फेरबदल करती है या नहीं। पार्टी के लिए फेरबदल करना जरूरी भी है जिससे लोगों में कुछ अलग संदेश जा सके। 

must read: मां तो आखिर मां होती है

मां तो आखिर मां होती है


कभी डांटतीं है तो कभी गले लगा लेती है, हमारी खुशी में खुश होकर अपने गम भुला देती है, हां वह मां होती है। शायद यह मां की दुआओं का ही असर है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। दोबारा प्रधानमंत्री  पद की शपथ लेने से पहले वह अपने मां का आशीर्वाद लेना अहमदाबाद पहुंचे थे।

 ऐसा कोई त्यौहार नहीं, कोई बड़ा मौका नहीं जब मोदी अपनी मां का आशीर्वाद लेने नहीं पहुंचे हो। अपने कामों में व्यस्त रहने के बाद भी वह अपनी मां की सेहत का पूरा ध्यान रखते हैं। कोई भी बड़ा मौका हो वह पहले अपनी मां के पास पहुंचकर उनका आशीर्वाद  लेना नहीं भूलते। शनिवार को भी मोदी अपनी मां का आशीर्वाद लेने गुजरात गए थे।
 इससे पहले जब उन्होंने वाराणसी से अपना नामांकन भरा था तब भी अपनी मां का आशीर्वाद लिया था। इसके अलावा 2014 लोकसभा चुनाव के बाद अपनी मां का आशीर्वाद लेकर ही दिल्ली गए थे। आज भी मोदी अपने जन्मदिन पर सबसे पहले अपने मां के पास जाते हैं।

 जब भी वह अपनी मां के पास जाते हैं तो प्रधानमंत्री बनकर नहीं बल्कि बेटा बनकर जाते हैं। उनकी मां से वह कितना प्यार करते हैं इस बात का अंदाजा तो तभी लग जाता है जब वह अपनी मां और उनके संघर्षों के बारे में बताते हैं तो उनकी आंखें भर आती है।

must read: महानायक + महाविजय + महोत्सव = मोदी

 लबों पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, वह मां ही है जो कभी खफा नहीं होती। हीराबेन अपने बेटे नरेंद्र मोदी को अपनी आंख का तारा मानती है। जब वह उनसे मिलने जाते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ जरूर देतीं हैं। मोदी  अपनी मां से मिले सवा रुपये को सवा सौ करोड़ देशवासियों का आशीर्वाद मानते हैं। आज मोदी जिन बुलंदियों को छू रहे है वह भी उनकी मां के आशीर्वाद का ही कमाल है।