सुरभि भावसार
राजनीति में परिवारवाद का लंबे समय से विरोध करने वाली आज खुद परिवारवाद की जद में है। खुद को परिवारवाद से दूर बताने वाली बसपा की मुखिया मायावती की पार्टी में अब भाई-भतीजावाद नजर आने लगा है। मायावती के इस फैसले ने साफ़ कर दिया है कि अब बसपा में परिवारवाद का सीधा दखल होगा।
रविवार को बड़ा फैसला लेते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को नेशनल को-आर्डीनेटर नियुक्त किया है। मायावती का यह फैसला तमाम सवालों को जन्म दे रहा है कि क्या अब तक परिवारवाद से दूर रही बसपा भी अब परिवारवाद की राजनीति करेगी? क्या बसपा को आगे बढ़ाने के लिए मायावती को कोई बाहर का सदस्य नहीं मिला?
इतना ही नहीं बसपा को परिवारवाद का रंग देने वाले मायावती के इस फैसले ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम का भी अपमान किया है। कांशीराम ने बसपा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के किसी सदस्य को आगे नहीं किया और मायावती का नाम आगे बढ़ाया।
चुनाव से पहले मायावती ने ये फैसला इसलिए नहीं लिया क्योकि उन्हें इस बात का डर था कि उनके उपर भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगेगा।
मायावती के इस फैसले के पीछे गौर किया जाए तो एक कारण यह भी है कि वह पार्टी के जरुरी मसलों पर बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं कर सकती। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए भी वह किसी बाहरी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहती। इसका भी कारण है कि उन्होंने राजनीती में जिस भी करीबी व्यक्ति पर भरोसा किया उसने विपक्ष का दामन थाम लिया।
इतिहास पर नजर डाले तो स्वामी प्रसाद मौर्या एक समय मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते थे लेकिन उन्होंने हाथी का साथ छोड़ भगवा गमछा ओढ़ लिया। इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकीभी मायावती का साथ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए।
इसके अलावा एक अहम् कारण है मायावती की बढती उम्र। 60 साल की उम्र पार कर चुकी मायावती को अब विरासत की भी चिंता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि बसपा में उनका उत्तराधिकारी कोई दलित या मुस्लिम ही हो सकता है लेकिन भाई और भतीजे को अहम् जिम्मेदारी देने के बाद क्या ये मां लिया जाए कि मायावती ने नया चेहरा खोज लिया है जिस पर वह भरोसा कर सके?









