Monday, June 24, 2019

परिवारवाद की जद में 'माया'



सुरभि भावसार 

राजनीति में परिवारवाद का लंबे समय से विरोध करने वाली आज खुद परिवारवाद की जद में है। खुद को परिवारवाद से दूर बताने वाली बसपा की मुखिया मायावती की पार्टी में अब भाई-भतीजावाद नजर आने लगा है। मायावती के इस फैसले ने साफ़ कर दिया है कि अब बसपा में परिवारवाद का सीधा दखल होगा। 

रविवार को बड़ा फैसला लेते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को नेशनल को-आर्डीनेटर नियुक्त किया है। मायावती का यह फैसला तमाम सवालों को जन्म दे रहा है कि क्या अब तक परिवारवाद से दूर रही बसपा भी अब परिवारवाद की राजनीति करेगी? क्या बसपा को आगे बढ़ाने के लिए मायावती को कोई बाहर का सदस्य नहीं मिला? 


इतना ही नहीं बसपा को परिवारवाद का रंग देने वाले मायावती के इस फैसले ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम का भी अपमान किया है। कांशीराम ने बसपा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के किसी सदस्य को आगे नहीं किया और मायावती का नाम आगे बढ़ाया।  

चुनाव से पहले मायावती ने ये फैसला इसलिए नहीं लिया क्योकि उन्हें इस बात का डर था कि उनके उपर भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगेगा। 

मायावती के इस फैसले के पीछे गौर किया जाए तो एक कारण यह भी है कि वह पार्टी के जरुरी मसलों पर बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं कर सकती। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए भी वह किसी बाहरी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहती। इसका भी कारण है कि उन्होंने राजनीती में जिस भी करीबी व्यक्ति पर भरोसा किया उसने विपक्ष का दामन थाम लिया। 


इतिहास पर नजर डाले तो स्वामी प्रसाद मौर्या एक समय मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते थे लेकिन उन्होंने हाथी का साथ छोड़ भगवा गमछा ओढ़ लिया। इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकीभी मायावती का साथ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए। 

इसके अलावा एक अहम् कारण है मायावती की बढती उम्र। 60 साल की उम्र पार कर चुकी मायावती को अब विरासत की भी चिंता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि बसपा में उनका उत्तराधिकारी कोई दलित या मुस्लिम ही हो सकता है लेकिन भाई और भतीजे को अहम् जिम्मेदारी देने के बाद क्या ये मां लिया जाए कि मायावती ने नया चेहरा खोज लिया है जिस पर वह भरोसा कर सके? 

Thursday, June 20, 2019

फिर ट्रोल हुए राहुल गांधी, राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान की ये हरकत



कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी किसी न किसी हरकत को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल होते रहते है। कई बार वह अपने भाषण के दौरान कुछ ऐसा बोल जाते है जिससे वह सोशल मीडिया पर छा जाते है या फिर कभी सबके बीच कुछ ऐसा कर जाते है कि कैमरे में कैद हो जाता है। 

हल ही में राहुल गांधी का एक ऐसा ही वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह संसद में मोबाइल चला रहे है। वीडियो उस समय का है जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद संसद में सरकार के अगले पांच साल का प्लान बता रहे थे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी मोबाइल में देखते नजर आए। एक घंटे से ज्यादा के राष्ट्रपति के अभिभाषण में पहले 24 मिनट तक राहुल अपने मोबाइल में व्यस्त रहे। 

24 मिनट मोबाइल में व्यस्त रहने के बाद अगले 20 मिनट वह बगल में बैठीं सोनिया गांधी से कुछ बातचीत करते रहे। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान एक भी बार राहुल गांधी ने मेज नहीं थपथपाई। सिर्फ आखिर में एक सेकेंड के लिए मेज को छुआ। वहीं सोनिया गांधी ने लगभग 6 बार मेज थपथपाई। 


https://twitter.com/knowthenation/status/1141593072410619904
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राष्ट्रपति ने जब उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक का जिक्र किया तो सांसदों ने लंबे समय तक मेज थपथपाई लेकिन राहुल नीचे देखते हुए शांत बैठे रहे।  

अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी तस्वीरें खींचने में व्यस्त रहे। बीच में सोनिया गांधी और राहुल गांधी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीर को देखकर कुछ चर्चा करते भी दिखे। इतना ही नहीं राहुल गांधी मंच की तस्वीरें खींचकर सोनिया गांधी को दिखाते नजर आए। 

राहुल गांधी के संसद से जाने तक कैमरों की नजर उनपर ही रही। भाषण ख़त्म होने के बाद राहुल गांधी वहां से जाने लगे तब सोनिया गांधी ने उन्हें इशारा किया कि राष्ट्रपति अभिनंदन करने के लिए आ रहे हैं। इसके बाद राहुल गांधी वहां रुके और महामहिम से हाथ मिलाया।  


Friday, June 14, 2019

मोदी को मिला दुनिया का साथ, अब होगा आतंक का विनाश?



सुरभि भावसार 

मंच कोई भी हो भारत अब आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सख्त रवैया यही बता रहा है कि भारत अब और आतंकवाद नहीं सहेगा। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हमेशा आतंकवाद का मुद्दा उठाने वाले भारत ने अब इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की मांग करते हुए आतंक को पनाह देने वाले देश को जिम्मेदार ठहराने की मांग की है।

साफ़-साफ़ देखा जाए तो एससीओ सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बिना नाम लिए सीधे पाकिस्तान पर प्रहार किया। प्रचंड जीत के बाद दुनिया जीतने निकले मोदी को दुनिया ने गले लगाया लेकिन पाकिस्तान के इमरान खान को हमेशा ही बैकफुट पर ही रहना पड़ा।

इस बैठक में मोदी और इमरान खान आमने-सामने आए लेकिन कोई बात हुई और ना ही कोई मुलाक़ात। इतना ही नहीं मोदी यहां दुनिया के सभी नेताओं के स्वागत में खड़े हुए और हाथ भी मिलाया लेकिन इमरान खान को संदेश दे दिया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत सख्त रवैया अपनाए हुए है। पाकिस्तान जब तक आतंकवाद के खिलाफ कदम नहीं उठाएगा भारत बातचीत नहीं करेगा। 

खास बात तो ये है कि बैठक के उद्घाटन समारोह में मोदी और इमरान खान एकसाथ हॉल में पहुंचे लेकिन इस दौरान मोदी ने इमरान खान से हाथ मिलाना तो दूर उनकी ओर देखा तक नहीं। इसके अलावा मोदी ने पाकिस्तान द्वारा खोले गए एयरस्पेस का भी इस्तेमाल नहीं किया। वह ओमान के रास्ते बिश्केक पहुंचे है।

आतंकवाद के खिलाफ मोदी को दुनिया का साथ भी मिल गया है। SCO 2019 के घोषणापत्र में क्रॉस बॉर्डर आतंकवाद अहम् मुद्दा बना है। पाकिस्तान के खिलाफ पीएम मोदी का ये सख्त रवैया यही बता रहा है कि अब भारत और आतंकवाद नहीं सहेगा। भारत आतंकवाद मुक्त समाज बनाने का पक्षधर है। अब सवाल ये है कि क्या पूरी दुनिया मिलकर आतंक को हरा पाएगी? क्या मोदी की कूटनीति के आगे पाकिस्तान झुकेगा?

Thursday, June 13, 2019

ख़ूनी राजनीति से बंगाल का पुराना नाता



पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों लाल रंग से रंगी नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव में ममता के गढ़ में सेंध लगाने के बाद बीजेपी और टीएमसी के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा का ये कोई पहला मामला नहीं है। राज्य में राजनीतिक हिंसा का इतिहास 150 साल पुराना है। ब्रिटिश काल के किसान आंदोलन से लेकर आजादी के बाद तेभागा आंदोलन, नक्सल आंदोलन, माओ आंदोलन के तहत जल, जंगल और जमीन का नारा वहां लोकप्रिय हुआ। लोकसभा चुनाव 2019 के चुनावों से हो रही हिंसा से बंगाल की हिंसा की संस्कृति को फिर ताजा कर दिया। 


1960 के दशक का चुनावी हथियार

बंगाल में रानीतिक हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। 1960 के दशक में राजनीतिक हिंसा बंगाल में चुनावी हथियार रहे है। वहां पर सत्ताधारी दल अपना बर्चस्व बनाए रखने के लिए हमेशा से शासन और प्रशासन का इस्तेमाल करते आए है। बंगाल में दशकों से जारी राजनीतिक हिंसा के तीन मुख्य कारण है- बढ़ती बेरोजगारी, विधि शासन पर सत्ताधारी दल का बर्चस्व। 

लेफ्ट फ्रंट के राज में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं 

पश्चिम बंगाल में 1977 से 2007 तक लेफ्ट फ्रंट ने राज किया। 30 साल तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार के सत्ता में रहने के दौरान 28 हजारराजनीतिक हत्याएं हुई। सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी वाम हिंसा का एक नमूना माना जाता है। इसके अलावा भी ढेरों घटनाएं ऐसी हैं जो कभी दर्ज ही नहीं हुईं।


2014 में 14 हत्याएं

लोकसभा चुनाव 2014 के विभिन्न चरणों के दौरान राज्य में 15 राजनीतिक हत्याएं हुईं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से मई 2014 के काल में पश्चिम बंगाल में 23 से ज्यादा राजनीतिक हत्याएं वहां पर हुईं।

 पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं

2018 में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई। व्यापक हिंसा को लेकर भाजपा ने दावा किया था कि चुनाव के दौरान पार्टी के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या टीएमसी ने कराई जबकि टीएमसी ने दावा किया था कि उसके 14 कार्यकर्ता मारे गए थे। 


2019 लोकसभा चुनाव में हिंसा

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। सात चरणों में हुए इन चुनावों के हर चरण में बंगाल में हिंसा हुई। हर चरण में हुई हिंसा के बावजूद बंगाल में बंपर वोटिंग हुई। 

11 अप्रैल को हुए पहले चरण में 83.80 प्रतिशत मतदान हुआ। इस दौरान अलीपुरदुआर और कूच बिहार पर टीएमसी और भाजपा समर्थकों में हिंसा हुई। कई बूथों पर मतदान धीमा रहा. टीएमसी समर्थकों ने लेफ्ट फ्रंट प्रत्याशी गोविंदा राय पर हमला किया, उनकी गाड़ी तोड़ी। 

दूसरे चरण के चुनाव में 81.72 फीसदी मतदान हुआ। रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई-एम सांसद मो. सलीम की कार पर टीएमसी समर्थकों पत्थरों और डंडों से हमला किया। 


तीसरे चरण में 81.97 फीसदी मतदान हुआ। हिंसा की 1500 शिकायत चुनाव आयोग को मिली। बूथों पर बमबाजी हुई. सीपीएम समर्थकों पर हमला। मुर्शिदाबाद में 56 वर्षीय कथित कांग्रेस समर्थक की टीएमसी समर्थकों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। कोलकाता में 60 लोग गिरफ्तार हुए। 

चौथे चरण में 82.84 फीसदी मतदान हुआ। आसनसोल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों में जमकर झड़प। कुछ टीएमसी कार्यकर्ताओं ने सांसद बाबुल सुप्रियो की कार का शीशा तोड़ दिया। 

पांचवें चरण में बैरकपुर में भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पें हुई। भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमला करने का आरोप लगाया।

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में केवल 2 सीटें मिली थी लेकिन पांच साल में भाजपा ने यहां अपना संगठन मजबूत किया और 2019 के चुनाव में 18 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया। इसका नतीजा है कि भाजपा राज्य में चौथे नंबर से दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है।

Friday, June 7, 2019

फिर हैवानियत, फिर गिरफ्तारी, फिर आश्वासन लेकिन कब तक...




सुरभि भावसार

जिस आंगन में वह नन्ही चिड़ियां चहचहाती थी, वहां अब मातम, गम और आंसू है। जहां वह बच्ची खेलती थी आज वह आंगन सुना पड़ा है। आज यह कहना पड़ रहा है कि बेटी हम शर्मिंदा है, तेरे कातिल अभी जिंदा है। हम कैसे समाज में रह रहे है, जहां आपसी रंजिश के चलते ढाई साल की मासूम की बेरहमी से हत्या कर दी जाती है और सबूत छिपाने के लिए उसका शव कूड़े के ढेर में फेक दिया जाता है। 

मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का है। यहां आपसी रंजिश के कारण ढाई साल की बच्ची की बेरहमी से हत्या कर दी गई। 30 मई को बच्ची घर से गायब हो गई। रातभर जब उसका पता नहीं लगा तो परिजनों ने 31 मई को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस को जिस मामले में जी-जान से जुट जाना चाहिए था, उसमे वह हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही। 


दो दिन बाद 2 जून को उसी बच्ची का शव कूड़े के ढेर में मिलता है। शव जिस हालत में मिला है उसे देखकर किसी भी रूह कांप सकती है। बच्ची की आंखें निकली हुई थी, उसका हाथ कटा हुआ था। आशंका जताई जा रही थी कि हत्या से पहले बच्ची के साथ रेप हुआ है लेकिन पुलिस मामला बढ़ते देख कह दिया कि बच्ची के साथ रेप नहीं हुआ है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि बच्ची का शव इस हालत में ही नहीं था कि बलात्कार जैसी हैवानियत की जांच की जा सके। बच्ची का शव गल चुका था। 

इस घटना ने फिर देश को झकझोर कर रख दिया है। एक बार फिर लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतर गए और नेताओं ने दुख जताते हुए ट्वीट कर दिए। बॉलीवुड ने फिर सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा दिखा दिया। फिर एक बार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया। आखिर कब तक ये सब होता रहेगा। क्यों सरकार आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती। योगी आदित्यनाथ के आने के बाद कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश रातोरात बदल जाएगा लेकिन कुछ नहीं हुआ। 


पिछले एक साल में  3704 बलात्कार हुए है। बलात्कार का ये आंकड़ा उस देश का है जहां लोग खुद को सभ्य कहते है। वोट कमाने के लिए नेता बहन-बेटियों की सुरक्षा पर बड़ी-बड़ी बातें करते है लेकिन वोट मिलते ही सब भूल जाते है। 

आखिर कब तक हमारे देश में ये सब चलता रहेगा। कब तक लोग मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतरते रहेंगे और न्याय मांगते रहेंगे। जिस तरह मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार होने पर सजा-ए-मौत का कानून लागू किया है, उसी को यदि सभी राज्य सरकारें लागू करें और उसका कठोरता से पालन किया जाए तो ऐसे मामलो पर लगाम लग सकती है। 



Thursday, June 6, 2019

पीएम मोदी के साथ चाय पीने का मौका, जल्द करें ये काम



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हर कोई मिलना चाहता है। वह जहां भी जाते है उनकी एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती है। क्या गली, क्या रोड और क्या बालकनी उनको देखने के लिए हर जगह लोग जमा हो जाते है। इसी बीच आप एक मौके का फायदा उठाकर पीएम मोदी के साथ बैठकर चाय पी सकते हैं। 


दरअसल, मोदी सरकार इनकम टैक्स देने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए एक योजना लेकर आई है।, जिसके तहत सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने वाले लोगों को प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री के साथ चाय पीने का मौका मिलेगा।  

सरकार की इस योजना का मकसद इनकम टैक्स कलेक्शन बढ़ाना है। कहा जा रहा है कि इस बारे में सरकार पहले बजट में कोई ऐलान कर सकती है। अभी तक टैक्स डिपार्टमेंट सबसे ज्यादा टैक्स चुकाने वाले लोगों को एप्रिसिएशन सर्टिफिकेट देता आ रहा है लेकिन अब उन्हें और ज्यादा प्रोत्साहित करने के लिए पीएम के साथ चाय पीने का मौका दे रहा है। 


ऐसे आया आईडिया 

सरकार को ये आईडिया तब आया जब 31 मार्च को फाइनेंशियल इयर ख़त्म होने में डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन सरकार के रिवाइज्ड टारगेट से भी कम रहा। सरकार ने 12 लाख करोड़ रुपये टैक्स कलेक्शन किया था। इसके बाद सरकार ने टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए यह योजना बनाई है। 

Tuesday, June 4, 2019

और फिर चल दिए तुम कहां, हम कहां



सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिए चुनावी सफ़र में साथ आए बुआ-बबुआ की राहें अब अलग होती दिख रही है। सफलता नहीं मिलने पर बुआ ने साथ छोड़ने के संकेत दिए तो बबुआ भी पीछे नहीं रहे और थोड़ी देर बाद कह दिया किअगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। अब गठबंधन की ये डोर टूटती नजर आ रही है। मायावती के इस रुख के बाद कहा जा रहा है कि क्या मायावती ने सपा से पुराना बदला लिया है? ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योकि मुलायम सिंह ने इस गठबंधन का विरोध किया था। 

दरअसल, मायावती द्वारा हार का ठीकरा अखिलेश पर फोड़ने के बाद से ही गठबंधन में दरार की अटकले लगाई जा रही थी, जिसपर मंगलवार को मायावती ने विराम लगा दिया। मायावती ने हार का ठीकरा अखिलेश यादव पर फोड़ते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव पर बीएसपी अकेले लड़ेगी। हालांकि दो टूक में मायावती ने यह भी कहा कि सपा प्रमुखअपने राजनीतिक कार्यों को करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को मिशनरी बनाते हैं तो फिर हम आगे साथ लड़ेगे। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो हमें अकेले ही चुनाव लड़ना होगा।


अखिलेश यादव भी बिना देर किए मीडिया के सामने आए और कहा कि गठबंधन के बारे में सोचकर विचार करेंगे, अगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। आगे उन्होंने कहा कि यदि उपचुनाव में अकेले लड़ने का फैसला हुआ है तो हम भी उपचुनाव अकेले लड़ने की तैयारी करेंगे। 

बसपा को मिला फायदा

दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए हाथी ने साइकिल की सवारी तो कर ली लेकिन वहां तक नहीं पहुंच पाए और अब साइकिल पंचर होती दिख रही है। नतीजों पर गौर किया जाए तो एसपी-बीएसपी गठबंधन का पूरा फायदा बसपा को ही मिला है। चुनाव में सपा शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गई वहीं सपा पांच सीटें ही जीत पाई है। 


मायावती रही सीनियर

सपा-बसपा गठबंधन पर ध्यान दिया जाए तो इस पूरे गठबंधन में मायावती सीनियर और अखिलेश जूनियर की भूमिका में रहे। इतना ही नहीं मायावती हमेशा अपनी शर्त रखती रही और अखिलेश उस शर्त को मानते रहे। शायद यही वजह है कि मायावती को शर्त की राजनीति करने के लिए जाना जाता है। 

मायावती ने अपने कोटे से आरएलडी को सीट देने से मना कर दिया था, जिसके बाद अखिलेश ने अपने कोटे से मथुरा सीट आरएलडी को दे दी। इसके अलावा सीट बंटवारे में भी मायावती ने सभी शहरी सीटें समाजवादी पार्टी के कोटे में दे दी। इनमे से 10 सीट ऐसी थी जहां भाजपा को हराना नामुमकिन था। 


उपचुनाव तय करेंगे सपा-बसपा की स्थिति

उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव सपा-बसपा अलग-अलग लड़ेगी। यही चुनाव 2022 की तस्वीर तय करेंगे और गठबंधन टूटने के बाद सपा-बसपा की स्थिति साफ़ करेंगे। भाजपा के लिए भी ये चुनाव इसलिए अहम् है क्योकि ये चुनाव मोदी के नाम पर नहीं होंगे। 

इसके अलावा एक सवाल ये भी उठ रहा है कि मायावती ने गठबंधन क्यों तोड़ा? क्या सच में चुनाव में सफलता नहीं मिलना इसका कारण है या फिर कुछ और? तो इसको लेकर कहा जा रहा है कि मायावती ने पहली बार उपचुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में कहा जा रहा है कि मायावती की नजर 2022 में सीएम की कुर्सी पर है। यदि उपचुनाव में गठबंधन लड़ता तो सीएम पद का उम्मीदवार अखिलेश यादव को बनाना पड़ता।

Monday, June 3, 2019

सादगी की मिसाल 'दीदी', आज भी चाय और मुरमुरे से करतीं हैं मेहमानों का स्वागत



साल 2011 से बंगाल की सत्ता संभाल रही ममता बनर्जी जितनी गुस्से वाली है उतनी ही नर्म दिल और सादगी से भरी हुई है। मुख्यमंत्री के पद पर रहने के बाद भी जितनी सादगी से वह रहती है उसका हर कोई कायल है। सफ़ेद साड़ी और स्लीपर पहनने वाली ममता संघर्ष भरे दिनों से जूझकर सत्ता तक पहुंची है। भले ही आज वह देश के बड़े राज्य की मुख्यमंत्री है लेकिन मेहमानों का स्वागत सादगी के साथ मुरमुरे और पानी से ही करती हैं।


5 जनवरी 1955 में कोलकाता में जन्मी ममता बनर्जी सादगी भरा जीवन जीने के लिए जानी जाती हैं। राजनीति में उनकी छवि तेज तर्रार और आक्रामक अंदाज वाले नेता की है। ममता ने कोलकामा विश्वविद्यालय से इस्‍लामिक इतिहास में एमए की डिग्री प्राप्त की है। साथ ही वह वकालत की पढ़ाई भी कर चुकी हैं। राजनीति के क्षेत्र में तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन क्या आप जानते है कि वह हमेशा सफ़ेद साड़ी ही क्यों पहनती है। शायद नहीं तो हम आपको बताते है इसके पीछे का कारण।

हमने ममता बनर्जी को जहां भी देखा है हमेशा सफ़ेद रंग की साड़ी पहने ही देखा है। दरअसल, ममता को सादा जीवन जीना ही पसंद है। जब वह 9 साल की थी तभी उनके पिता का निधन हो गया था। उनका परिवार गरीबी से झूझने लगा और इस वजह से उन्हें कपड़े खरीदने का भी शौक नहीं रहा। आज उन्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं है लेकिन आज भी वह अपने घर आए मेहमानों का स्वागत मुरमुरे और पानी से हीं किया करतीं हैं।


दीदी का राजनीतिक सफ़र-

दीदी के नाम से जानी जाने वाली ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र 1970 में शुरू हुआ, जब वह कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता बनीं। 1976 से 1980 तक वह महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। 1984 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराकर सबसे युवा सांसद बनीं।

ममता दो बार रेल मंत्री भी रह चुकी है। इसके अलावा वह केंद्र सरकार में कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल के साथ ही महिला व बाल विकास की राज्य मंत्री भी रह चुकी हैं। 2011 में उन्‍होंने पश्‍चि‍म बंगाल में वामपंथी मोर्चे का सफाया किया और राज्य की मुख्यमंत्री बनीं।


Sunday, June 2, 2019

बीजेपी की इस बड़ी नेता का कैसा विश्वास, दिन के हिसाब से पहनती है साड़ी



भारतीय संस्कृति को समेटे हुए माथे पर लाल बिंदी, मांग में सिंधूर, चौड़े पट्टे के बॉर्डर वाली साड़ी उनकी पहचान बन चुकी है। बुधवार है तो तय है कि भाजपा की यह वरिष्ठ मंत्री हरे रंग की साड़ी में ही नजर आएंगी। जी हां, हम बात कर रहे है पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की। वह जहां भी जाती है भारतीय संस्कृति को साथ लेकर जाती है और यही कारण है कि विदेशों में भी उनकी खूब तारीफ़ होती है। चौड़े पट्टे की साड़ी पर स्टाइलिश जैकेट उनकी पहचान बन गया है। वह देश की लोकप्रिय नेताओं में से एक मानी जाती है।

must read: सेल्स गर्ल का काम करती थीं यह मंत्री, आज हाथों में है देश के खजाने की चाबी

आज हम आपको उनसे जुडी एक ख़ास बात बताने जा रहे है. जो शायद आपने कभी नहीं सुनी होगी। सुषमा स्वराज एक धार्मिक महिला हैं, वह हर त्यौहार को पारंपरिक तरीके से मनाती हैं। कहा जाता है कि वह पहनावे से लेकर खाने तक का चयन दिन के हिसाब से करती हैं। हफ्ते के सातों दिन अलग-अलग रंग की साड़ियां पहनती है।

must read: क्रिकेट खेलने के शौकीन शाह क्या कर पाएंगे 'धारा 370' को आउट?

इस बात का खुलासा उस समय हुआ जब कुछ सालों पहले पाकिस्तान दौरे के दौरान हरे रंग कि साड़ी पहनी थी। इसको लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने कई तरह के सवाल खड़े किए थे, तब उन्होंने बताया था की वह दिन के हिसाब से साड़ी पहनती है। बुधवार को वह हरी साड़ी पहनती है और उस दिन बुधवार ही था।

Saturday, June 1, 2019

क्रिकेट खेलने के शौकीन शाह क्या कर पाएंगे 'धारा 370' को आउट?



सुरभि भावसार

मोदी सरकार में नंबर 2 के नेता अमित शाह के सामने अब गृह मंत्री बनने के बाद देश के अंदरुनी मामलों से निपटने की चुनौतियां होगी। शाह को जम्मू-कश्मीर, नक्सलवाद, आतंकवाद, पश्चिम बंगाल में बढ़ते बांग्लादेशियों की संख्या और सीमा पर पड़ोसी देश की नापाक हरकतों पर लगाम लगाने के लिए कमर कसनी होगी। गुजरात सरकार में लगातार नौं साल तक गृह मंत्री का पद संभालने वाले अमित शाह देश को तोड़ने वाली नब्जों को आसानी से दबोच सकते है। वैसे भी गुजरात दंगों के बाद अमित शाह ने गृह मंत्री रहते हुए अप्रिय घटनाओं पर ऐसा अंकुश लगाया कि कोई बड़ा मामला वहां से आज तक निकलकर सामने नहीं आया।


धारा 370

जम्मू-कश्मीर में साल के अंत में चुनाव हो सकते है। ऐसे में हमेशा से भाजपा का एजेंडा धारा 370 को खत्म करना और अनुच्छेद 35 ए को निरस्त करने का रहा है, जिसपर गृह मंत्रालय का रुख राज्य की सियासत में काफी उतार-चढ़ाव लाने वाला साबित हो सकता है। अमित शाह के सामने इन मामलों से निपटना एक बड़ी चुनौती होगी। अब देखना ये होगा कि क्या शाह धारा 370 को आउट कर पाएंगे?

पश्चिम बंगाल

इसके अलावा पश्चिम बंगाल की सियासी स्थिति को लेकर भी देश की निगाहें अमित शाह पर टिकी हुई है। गौरतलब है कि बंगाल में दीदी की कानून व्यवस्था और राज्य से हिंसा की खबर आती रहती है। बंगाल में भाजपा और टीएमसी के बीच चल रहे तनाव के बीच यह देखना भी काफी दिलचस्प होगा कि बतौर गृह मंत्री अमित शाह और दीदी के बीच कानून व्यवस्था और दूसरे मामलों में संबंध कैसे होंगे।


नक्सलवाद

इन दिनों नक्सली हमलों की संख्या भी बढ़ी है। कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो नक्सली हिंसा में कमी आई है। आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में माओवादी कमजोर पड़े हैं, लेकिन छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और बिहार में हमले तेज हो गए है। ऐसे में अमित शाह के सामने नक्सलवाद को पूरी तरह से कुचलना एक बड़ी चुनौती है।

आतंकवाद

अमित शाह हमेश कहते रहे है कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी और उनकी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति हमेशा रहेगी। ऐसे में अब घाटी को आतंक मुक्त करने की जिम्मेदारी अमित शाह के कंधो पर है। सीमा पार से बढ़ रही आतंकी घटनाओं पर काबू पाना अब गृह मंत्री के सामने बड़ी चुनौती है।

एनआरसी 

भाजपा पूर्वोत्तर में लगातार पैर पसारने की कोशिश कर रही है। कयास लगाए जा रहे है कि गृह मंत्रालय की प्राथमिकता पूर्वोत्तर भी हो सकता है। ऐसे में अमित शाह के सामने एक चुनौती एनारसी को लागू करवाने की भी है।


असम में एनआरसी को लेकर भी विवाद बढ़ा है। कोई भी वाजिब भारतीय नागरिक एनआरसी से बाहर न रह जाए, यह सुनिश्चित करना नए  गृह मंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती है। अमित शाह कहते रहे है कि देश में अवैध रुप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकाल बाहर करेंगे। अब देखन यह है कि शाह इस चुनौती का सामना कैसे करते है।

ये सभी जानते है कि असम सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में एनआरसी का जमकर विरोध हो रहा है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध करने में मुखर रही हैं। ऐसे में यदि अमित शाह इसे लागू करते है कि ममता सरकार के साथ उनका टकराव और भी बढ़ सकता है।