सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिए चुनावी सफ़र में साथ आए बुआ-बबुआ की राहें अब अलग होती दिख रही है। सफलता नहीं मिलने पर बुआ ने साथ छोड़ने के संकेत दिए तो बबुआ भी पीछे नहीं रहे और थोड़ी देर बाद कह दिया किअगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। अब गठबंधन की ये डोर टूटती नजर आ रही है। मायावती के इस रुख के बाद कहा जा रहा है कि क्या मायावती ने सपा से पुराना बदला लिया है? ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योकि मुलायम सिंह ने इस गठबंधन का विरोध किया था।
दरअसल, मायावती द्वारा हार का ठीकरा अखिलेश पर फोड़ने के बाद से ही गठबंधन में दरार की अटकले लगाई जा रही थी, जिसपर मंगलवार को मायावती ने विराम लगा दिया। मायावती ने हार का ठीकरा अखिलेश यादव पर फोड़ते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव पर बीएसपी अकेले लड़ेगी। हालांकि दो टूक में मायावती ने यह भी कहा कि सपा प्रमुखअपने राजनीतिक कार्यों को करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को मिशनरी बनाते हैं तो फिर हम आगे साथ लड़ेगे। अगर वह ऐसा नहीं कर पाते तो हमें अकेले ही चुनाव लड़ना होगा।
अखिलेश यादव भी बिना देर किए मीडिया के सामने आए और कहा कि गठबंधन के बारे में सोचकर विचार करेंगे, अगर रास्ते अलग हैं तो हम भी लोगों का स्वागत करेंगे। आगे उन्होंने कहा कि यदि उपचुनाव में अकेले लड़ने का फैसला हुआ है तो हम भी उपचुनाव अकेले लड़ने की तैयारी करेंगे।
बसपा को मिला फायदा
दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने के लिए हाथी ने साइकिल की सवारी तो कर ली लेकिन वहां तक नहीं पहुंच पाए और अब साइकिल पंचर होती दिख रही है। नतीजों पर गौर किया जाए तो एसपी-बीएसपी गठबंधन का पूरा फायदा बसपा को ही मिला है। चुनाव में सपा शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गई वहीं सपा पांच सीटें ही जीत पाई है।
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मायावती रही सीनियर
सपा-बसपा गठबंधन पर ध्यान दिया जाए तो इस पूरे गठबंधन में मायावती सीनियर और अखिलेश जूनियर की भूमिका में रहे। इतना ही नहीं मायावती हमेशा अपनी शर्त रखती रही और अखिलेश उस शर्त को मानते रहे। शायद यही वजह है कि मायावती को शर्त की राजनीति करने के लिए जाना जाता है।
मायावती ने अपने कोटे से आरएलडी को सीट देने से मना कर दिया था, जिसके बाद अखिलेश ने अपने कोटे से मथुरा सीट आरएलडी को दे दी। इसके अलावा सीट बंटवारे में भी मायावती ने सभी शहरी सीटें समाजवादी पार्टी के कोटे में दे दी। इनमे से 10 सीट ऐसी थी जहां भाजपा को हराना नामुमकिन था।
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उपचुनाव तय करेंगे सपा-बसपा की स्थिति
उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव सपा-बसपा अलग-अलग लड़ेगी। यही चुनाव 2022 की तस्वीर तय करेंगे और गठबंधन टूटने के बाद सपा-बसपा की स्थिति साफ़ करेंगे। भाजपा के लिए भी ये चुनाव इसलिए अहम् है क्योकि ये चुनाव मोदी के नाम पर नहीं होंगे।
इसके अलावा एक सवाल ये भी उठ रहा है कि मायावती ने गठबंधन क्यों तोड़ा? क्या सच में चुनाव में सफलता नहीं मिलना इसका कारण है या फिर कुछ और? तो इसको लेकर कहा जा रहा है कि मायावती ने पहली बार उपचुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में कहा जा रहा है कि मायावती की नजर 2022 में सीएम की कुर्सी पर है। यदि उपचुनाव में गठबंधन लड़ता तो सीएम पद का उम्मीदवार अखिलेश यादव को बनाना पड़ता।

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