Thursday, June 13, 2019

ख़ूनी राजनीति से बंगाल का पुराना नाता



पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों लाल रंग से रंगी नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव में ममता के गढ़ में सेंध लगाने के बाद बीजेपी और टीएमसी के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा का ये कोई पहला मामला नहीं है। राज्य में राजनीतिक हिंसा का इतिहास 150 साल पुराना है। ब्रिटिश काल के किसान आंदोलन से लेकर आजादी के बाद तेभागा आंदोलन, नक्सल आंदोलन, माओ आंदोलन के तहत जल, जंगल और जमीन का नारा वहां लोकप्रिय हुआ। लोकसभा चुनाव 2019 के चुनावों से हो रही हिंसा से बंगाल की हिंसा की संस्कृति को फिर ताजा कर दिया। 


1960 के दशक का चुनावी हथियार

बंगाल में रानीतिक हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। 1960 के दशक में राजनीतिक हिंसा बंगाल में चुनावी हथियार रहे है। वहां पर सत्ताधारी दल अपना बर्चस्व बनाए रखने के लिए हमेशा से शासन और प्रशासन का इस्तेमाल करते आए है। बंगाल में दशकों से जारी राजनीतिक हिंसा के तीन मुख्य कारण है- बढ़ती बेरोजगारी, विधि शासन पर सत्ताधारी दल का बर्चस्व। 

लेफ्ट फ्रंट के राज में 28 हजार राजनीतिक हत्याएं 

पश्चिम बंगाल में 1977 से 2007 तक लेफ्ट फ्रंट ने राज किया। 30 साल तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार के सत्ता में रहने के दौरान 28 हजारराजनीतिक हत्याएं हुई। सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी वाम हिंसा का एक नमूना माना जाता है। इसके अलावा भी ढेरों घटनाएं ऐसी हैं जो कभी दर्ज ही नहीं हुईं।


2014 में 14 हत्याएं

लोकसभा चुनाव 2014 के विभिन्न चरणों के दौरान राज्य में 15 राजनीतिक हत्याएं हुईं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से मई 2014 के काल में पश्चिम बंगाल में 23 से ज्यादा राजनीतिक हत्याएं वहां पर हुईं।

 पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं

2018 में पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनावों में भी हिंसा हुई। व्यापक हिंसा को लेकर भाजपा ने दावा किया था कि चुनाव के दौरान पार्टी के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या टीएमसी ने कराई जबकि टीएमसी ने दावा किया था कि उसके 14 कार्यकर्ता मारे गए थे। 


2019 लोकसभा चुनाव में हिंसा

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली। सात चरणों में हुए इन चुनावों के हर चरण में बंगाल में हिंसा हुई। हर चरण में हुई हिंसा के बावजूद बंगाल में बंपर वोटिंग हुई। 

11 अप्रैल को हुए पहले चरण में 83.80 प्रतिशत मतदान हुआ। इस दौरान अलीपुरदुआर और कूच बिहार पर टीएमसी और भाजपा समर्थकों में हिंसा हुई। कई बूथों पर मतदान धीमा रहा. टीएमसी समर्थकों ने लेफ्ट फ्रंट प्रत्याशी गोविंदा राय पर हमला किया, उनकी गाड़ी तोड़ी। 

दूसरे चरण के चुनाव में 81.72 फीसदी मतदान हुआ। रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई-एम सांसद मो. सलीम की कार पर टीएमसी समर्थकों पत्थरों और डंडों से हमला किया। 


तीसरे चरण में 81.97 फीसदी मतदान हुआ। हिंसा की 1500 शिकायत चुनाव आयोग को मिली। बूथों पर बमबाजी हुई. सीपीएम समर्थकों पर हमला। मुर्शिदाबाद में 56 वर्षीय कथित कांग्रेस समर्थक की टीएमसी समर्थकों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। कोलकाता में 60 लोग गिरफ्तार हुए। 

चौथे चरण में 82.84 फीसदी मतदान हुआ। आसनसोल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों में जमकर झड़प। कुछ टीएमसी कार्यकर्ताओं ने सांसद बाबुल सुप्रियो की कार का शीशा तोड़ दिया। 

पांचवें चरण में बैरकपुर में भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पें हुई। भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह ने टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमला करने का आरोप लगाया।

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य में केवल 2 सीटें मिली थी लेकिन पांच साल में भाजपा ने यहां अपना संगठन मजबूत किया और 2019 के चुनाव में 18 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया। इसका नतीजा है कि भाजपा राज्य में चौथे नंबर से दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है।

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