Friday, November 29, 2019

सपना साकार या सत्ता से प्यार!



सुरभि भावसार

राजनीति सिर्फ जनता की सेवा के लिए नहीं, यहां सत्ता भी सबको चाहिए होती है। तमाम उठा-पटक और सियासी घमासान के बीच उद्धव ठाकरे के सिर पर मुख्यमंत्री का ताज सज गया है। उद्धव ठाकरे ने भले ही अपने पिता बालासाहेब का सपना पूरा कर दिया है लेकिन सत्ता के लिए उन्हें अपने पिता की ही विचारधारा से समझौता करना पड़ा है। सत्ता ने शिवसेना को अपने मूल सिद्धांतों से दूर कर दिया। 

वो कहते है ना कि राजनीति जो कराए वो कम है। इसका सटीक उदाहरण महाराष्ट्र में देखने को मिला है। सत्ता के लिए शिवसेना ने अपने 30 साल पुराने साथी भाजपा का साथ छोड़कर अपने से उलट विचारधारा वाली एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया। ये साफ़ है कि शिवसेना हमेशा से ही कट्टर हिंदुत्व की छवि को लेकर आगे बढ़ी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर आंदोलन में भी शिवसेना ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

उद्धव ठाकरे के उलट विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना कई सवालों को जन्म दे रहा है। सवाल उठ रहे है कि उद्धव ठाकरे का सीएम बनना बालासाहेब का सपना पूरा करना है या फिर सत्ता से प्यार है? क्या शिवसेना ने सत्ता के लिए हिंदुत्व की राजनीति से समझौता कर लिया? कुछ तो यहां तक कह रहे है कि उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना पिता का सपना साकार करना कम और सत्ता के लिए प्यार ज्यादा लग रहा है। 

बालासाहेब का सपना पूरा करने वाले उद्धव ठाकरे ये कैसे भूल सकते है कि उनके पिता ने कभी हिंदुत्व से समझौता नहीं किया था। पिछले चार दशकों से जो शिवसेना कट्टर हिंदुत्व की छवि और सिद्धांतों को लेकर राजनीति में शिखर तक पहुंची, वहीं सत्ता के लिए अपने मूल सिद्धांतों के साथ समझौता कर बैठी है। 

शिवसेना का ये बदला रूप उन कार्यकर्ताओं को नहीं सुहा रहा जो सड़कों पर हिंदुत्व की राजनीति करते थे क्योकि अब उस आम कार्यकर्ता को कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन वाली सरकार के चलते कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अनुसार राजनीति करने के लिए विवश होना पड़ेगा। 

उद्धव ठाकरे की जिद के आगे भले ही शिवसैनिक दबे मन से कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन वाली सरकार को स्वीकार कर रहे हो लेकिन ये चुप्पी कब तक बनी रहेगी ये तो समय ही बताएगा। कहा जा रहा है कि सीएम की कुर्सी भले ही उद्धव ठाकरे को मिली है लेकिन सत्ता की असली चाबी एनसीपी प्रमुख शरद पंवार के हाथों में है। ऐसे में राजनीतिक पंडित उद्धव ठाकरे सरकार को दूर का सफर तय करते नहीं देख रहे हैं।

Saturday, November 2, 2019

ये कैसी सौदेबाज़ी!



सुरभि भावसार

हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों सहित क्षेत्रीय पार्टियों का सफया हो गया और बीजेपी अपने महाजनादेश के साथ एक बार फिर सत्ता पर काबिज हो गई। लोकसभा चुनाव में भाजपा भले ही राष्ट्रवाद के दम पर केंद्र की कुर्सी पर विराजमान हुई है, लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव ने सियासी तस्वीर बदल कर रख दी है। इनमें बीजेपी को क्षेत्रीय दलों के सामने झुकने पर मजबूर होना पड़ा है।

वर्तमान राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ने लगा है। यही कारण है कि क्षेत्रीय दल राजनीति को व्यापारिक सौदे में बदलने की सीनाजोरी कर रहे हैं क्योकि उसका पूरा खेल सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने का रहता है।

कड़वा जरुर है लेकिन ये सच है। आज की राजनीति में खुले तौर पर भाव-ताव हो रहे है। राजनीति में सौदेबाजी की शुरुआत उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के उदय के बाद हुई थी। ऐसी राजनीति की शुरुआत बेशक क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण हुई है लेकिन राष्ट्रीय दल भी इससे अछूते नहीं रहे है। सौदेबाज़ी की ये राजनीति कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की सरकार में भी देखने को मिली थी।

हालांकि शिवसेना भले ही मुख्यमंत्री पद के लिए 50-50 के फ़ॉर्मूले पर अड़ी हो लेकिन पार्टी की बैठक में अपने युवा नेता आदित्य ठाकरे को पीछे रखकर वरिष्ठ नेता एकनाथ शिन्दे को विधायक दल का नेता बनाकर शिवसेना ने संकेत दिया है कि वह अपनी शर्तों में ढील छोड़ने के लिए तैयार है। खैर जो भी है लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना सरकार का ही गठन होना है क्योकि इसके अलवा कोई और दूसरा विकल्प ही नहीं है।

Saturday, September 7, 2019

चंद्रयान-2: डिगे नहीं है, अडिग है हम, लौटकर फिर आएंगे



सुरभि भावसार 

जीरो का आविष्कार हो या चांद पर जाने का सपना, भारत ने हमेशा ही अपने कारनामों से दुनिया को चैंकाया है। इस बार भले ही चांद पर पहुंचने में कामयाब नहीं हुए, लेकिन हौसले बुलंदी पर है। हालांकि चंद्रयान-2 के चांद से चंद कदम दूर तक पहुंचने के बाद संपर्क टूट गया था। इससे वैज्ञानिक निराश हो गए थे, मगर वह एक बार फिर पूरे जोश के साथ उठ खड़े हुए हैं। मिशन भले ही सफल नहीं हो पाया हो, पर हर भारतीय को वैज्ञानिकों की सालों की मेहनत पर गर्व है और इस सफलता पर वैज्ञानिकों को सेल्यूट किया है। 

ऐसा नहीं है कि चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर क्षतिग्रस्त हो गया है, उसका ऑर्बिटर अब भी पूरी शान से चांद के चक्कर लगा रहा है, जो लगभग सालभर तक शोध करेगा, साथ ही हर छोटी-छोटी जानकारी धरती पर भेजेगा। यह भी किसी सफलता से कम नहीं है, दुनिया के अन्य देशों के मिशन तो चांद के चक्कर लगाने से पहले ही धराशायी हो गए थे, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने चांद तक पहुंचने में सफलता हासिल की है।

उपलब्धि की बात करें तो भारत से पहले अमेरिका, रूस और चीन चांद तक पहुंचे चुके हैं, मगर हम इस बार रह गए हैं, किंतु अगली बार लक्ष्य को भेदकर ही मानेंगे। ऐसा नहीं है कि ये तीनों देशों अपने दम पर चांद तक पहुंचे, इसके लिए उनको भारतीय शक्ति का सहारा लेना पड़ा था। भारत के दशमलव और जीरो की खोज के बाद ही दुनिया धरती और चांद की दूरी का अंदाजा लगा पाई है। यदि भारत दुनिया को दशमलव नहीं देता तो आज इन देशों का भी चांद पर जाना मुमकिन नहीं था। 

हिंदुस्तान ने कई ऐसे कारनामे किए हैं, जिससे दुनिया की आंखें फटी रह गई। मंगल गृह पर तिरंगा फहराने का रिकॉर्ड दुनिया में केवल भारत के नाम है। ये भारत ही है, जिसने दुनिया को चांद पर पानी होने की जानकारी दी है। हमने ही 100 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करके नया इतिहास रचा है। जब सफलता इतनी हो तो एक-दो रुकावट हमें पीछे नहीं कर सकती।

आज चांद पर जाने का मिशन पूरा नहीं हुआ तो क्या हुआ, ये सपना टूटा नहीं है और ना ही हौसला कम हुआ है। आज चंद्रमा को छूने की हमारी इच्छाशक्ति और दृढ़ हुई है, संकल्प और प्रबल हुआ है। अब हम दोगुने हौसले से खड़े होंगे, हमारा विश्वास और बढ़ गया है। हिंदुस्तान एक असफलता से टूटकर मायूस होने वालों में से नहीं, बल्कि दोगुने जोश के साथ खड़े होकर लक्ष्य प्राप्त कर बैठने वालों में से है। हम उठेंगे, दौड़ेंगे और चांद पर भी पहुंचेंगे। आखिरी कदम पर भले ही रुकावट आई हो, लेकिन हम डिगे नहीं है।

Tuesday, August 6, 2019

नया इतिहास, नया कश्मीर



सुरभि भावसार 

नहीं पड़ेंगे अब शेरों के गालों पर थप्पड़, कश्मीर में भी गूंजेगा 'जय हिंद' का नारा, पूरे हिंदुस्तान में लहराएगा सिर्फ तिरंगा क्योंकि अब इतिहास बदल गया है। 370 में बंधा  हुआ कश्मीर अब आजाद हो गया है, डल झील और गंगा की धार एक हो गई है, भारत अखंड हो गया है, यह सब मुमकिन हो पाया है तो सिर्फ 56 इंच के फैसले के कारण

मोदी सरकार का यह फैसला वाकई काबिले तारीफ है। कांग्रेस आज मोदी सरकार के इस फैसले का जिस हिम्मत से विरोध कर रही है शायद इतनी हिम्मत से उस समय खड़ी हो जाती तो शायद कश्मीर के कुछ हिस्से पर आज पाकिस्तान का कब्जा नहीं होता। खैर दाद देनी पड़ेगी मोदी सरकार की उस हिम्मत और फैसले की जिसने कश्मीर का राग अलपने वाले पाकिस्तान को उसकी औकात दिखा दी। 

56 इंच के फैसले ने कश्मीर के विकास में आने वाले रोड़े को तो जड़ से खत्म कर दिया लेकिन लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह के तेवर कुछ और ही कह रहे थे। लग रहा है कि  उनकी नजर पीओके पर भी है। गृहमंत्री ने जब सदन में कहा कि 'जब मैं जम्मू कश्मीर बोलता हूं तो उसका मतलब पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भी है, कश्मीर के लिए हम अपनी जान भी दे देंगे' इस दौरान उनका गुस्सा देखकर लग रहा था कि पीओके अभी बाकी है। सदन में उनके तेवर इतने कड़े थे जिसको देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि शायद अब अमित शाह पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ा कर ही दम लेंगे।

मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले ने इतिहास  रच दिया है लेकिन एक बात यह समझ में नहीं आ रही कि जो लोग देश को ही अपना सब कुछ बताते थे, देश के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, आज वही लोग क्यों सरकार के उस फैसले के विरोध में उतर आए हैं जिससे मां भारती का सिर गर्व से ऊंचा हो रहा है। क्यों आज वही लोग इस फैसले के खिलाफ हो गए हैं जो भारत को अखंड बना रहा है।

कश्मीर में कल सूरज तो निकलेगा लेकिन सुबह नई होगी, झेलम का पानी तो वही रहेगा लेकिन अब आजादी से बहेगा, खूबसूरत वादियों में देशभक्ति की हवा बहेगी, कश्मीर की माटी में आतंक का बारूद नहीं चंदन की खुशबू महकेगी क्योकि ये ऩया कश्मीर है।

Sunday, July 28, 2019

आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से डर कैसा?


सुरभि भावसार 

जब देश के जवान सरहद पर तैनात होते है तो वो राजनीति नही करते। मां भारती की रक्षा के लिए उस जवान के लिए देशसेवा ही सबकुछ होती है। खून में देशभक्ति, जुबान पर 'जय हिंद' का नारा और आंखों में दुश्मनों के लिए गुस्सा, भारतीय सेना का देश के लिए यही समर्पण देखकर ही दुश्मन कांप उठता है। इन जवानों को दिल्ली की गद्दी पर बैठने वालों के कानून से कोई मतलब नहीं होता लेकिन जब सेना के समर्थन की बात आती है तो कुछ राजनीतिक दल वोटबैंक के लिए इसका विरोध करने से भी पीछे नहीं हटते है।


आतंकियों के खिलाफ जब कोई बात सदन में हो या सदन के बाहर हो तो हमेशा उसका विरोध करते है। जब सदन में आतंकवाद के खिलाफ सरकार क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 (यूएपीए बिल) लाई तो सोनिया गांधी सहित पूरी कांग्रेस ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

दरअसल, इस बिल से एनआईए को मजबूती मिलेगी और आतंकवाद पर नकेल कसेगी। इस बिल के तहत यदि कोई व्यक्ति आंतकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है या उसमें भाग लेता है तो उसे आतंकवादी घोषित किया जाएगा। यानी अब सरकार किसी संगठन के साथ-साथ किसी व्यक्लती विशेष को भी आतंकी घोषित कर सकती है।

आतंकवाद के खिलाफ इस अहम् बिल पर चर्चा के दौरान कांग्रेस का सदन से वॉकआउट कर जाना तमाम सवालों को जन्म दे रहा है। कांग्रेस को आतंकियों को आर्थिक मदद करने वाले ओर जेहादी साहित्य से आतंकी बनाने वाले लोगो से क्या सहानुभूति है जो कांग्रेस ने वोट करने की बजाय सदन का बहिष्कार कर दिया? कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस देश के साथ खड़ी है या आतंकियों के साथ?


इधर, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती कश्मीर में अतिरिक्त 10 हजार जवानों की तैनाती का विरोध कर रहीं हैं। उनक कहना है कि कश्मीर में अतिरिक्त जवानों की तैनाती ने डर का माहौल पैदा कर दिया है। आज महबूबा को उस सेना से डर लग रहा है जो सेना कश्मीर में आई बाढ़ के समर कश्मीरियों के लिए देवदूत बनकर खड़ी हो गई थी। महबूबा को सेना की तैनाती का डर है या आतंकवाद के खात्मे का ?

यहां ये कहना गलत नही होगा किआतंकवाद को ख़त्म करने के लिए केवल आतंकवादियों को ख़त्म करना ही काफी नहीं है। इसके लिए सबसे पहले उन्हें ख़त्म करना होगा जो आतंकियों को आथिॅक सहायता देते है और उन्हें पालते हैं। ऐसे में जब तक देश के सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आकर एक स्वर में आतंकवाद के पनाहगारों को जड़ से ख़त्म करने के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक देश में कितने भी आतंकियों का सफाया कर दे, दीमक रुपी आतंकवाद का पूर्ण रूप से क्रियाक्रम असंभव सा लगता है।



Saturday, July 20, 2019

नरम रवैया और साफ़-सुथरी छवि के लिए हमेशा याद की जाएंगी शीला दीक्षित


सुरभि भावसार 

राजनीति का चमकता सितारा और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित अब हमारे बीच नहीं रही। शनिवार को 81 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और दिल्‍ली की तीन बार मुख्‍यमंत्री रहीं शीला दीक्षित कांग्रेस पार्टी का बड़ा चेहरा मानी जाती थी।

राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और दिल्‍ली की तीन बार मुख्‍यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को कॉलेज के जमाने से ही राजनीति में दिलचस्पी थी। मुख्यमंत्री रहने के बाद शीला दीक्षित केरल की राज्यपाल भी बनीं। 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद रहीं।

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शीला दीक्षित ने दिल्ली में कई विकास कार्य किए है। शीला दीक्षित का राजनीतिक सफ़र बढ़िया चल रहा था तभी आम आदमी पार्टी वजूद में आई। आम आदमी पार्टी की ऐसी आंधी चली कि शीला को हार का सामना करना पड़ा। शीला दीक्षित की हार को लेकर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वह विरोधी लहर का शिकार हुई थी, उनके काम में कोई कमी नहीं थी और ना ही जनता में उनको लेकर कोई नाराजगी थी।

मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी उन्हें जनता का प्यार मिलता रहा। शीला दीक्षित को कांग्रेस उन चंद नेताओं में गिना जता है जो पार्टी के बुरे समय में साथ रहे। उन्हें  एक मंजी हुई राजनेता के रूप में जाना जाता रहा है। उनके नरम रवैया के लिए भी अक्सर तारीफ की जाती है ।

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शीला दीक्षित ने कुछ ऐसे काम भी किए है जिसने लोगों की जिंदगी पर भी गहरा असर डाला। उन्‍होंने लड़कियों को स्‍कूल में लाने के लिए पहली बार 'सेनेटरी नैपकिन' बंटवाया था। दिल्ली में पहले फ्लाईओवर का आधार, मेट्रो, सीएनजी और दिल्‍ली की हरियाली शीला दीक्षित की ही देन है। आज देश ने राजनीति का चमकता सितारा खो दिया है।








Friday, July 19, 2019

रेप कर भागा आरोपी, तो सऊदी से घसीटकर भारत लाई ये आईपीएस ऑफिसर



रेप की घटनाएं पुलिस के लिए आम बन गई है। आरोपी छोटी-छोटी बच्चियों को हवस का शिकार बनाकर विदेश भाग जाते है और पुलिस  और भारतीय एजेंसियों के लिए यह एक छोटा केस हो जाता है। पीड़ित बच्ची आत्महत्या कर लेती है लेकिन घटना के दो साल बाद भी उसके आरोपी को नहीं पकड़ पाती। इसी बीच एंट्री होती है एक ऐसी आईपीएस ऑफिसर की जो आरोपी को विदेश से घसीटकर ले आती है। 

जी हां, हम बात कर रहे है केरल के कोल्लम की आईपीएस ऑफिसर मेरिन जोसेफ की। मेरिन जोसेफ ही 13 साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले आरोपी को सऊदी अरब से घसीटकर भारत लाई है। 


दरअसल, मेरिन जब यहां की आईपीएस ऑफिसर बनी तो उन्होंने अपराध की सभी फाइलें मंगवाई। इस दौरान एक फाइल ऐसी निकली जिसका आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर था। जब मेरिन ने इस मामले की जांच की तो मामला 13 साल की बच्ची के साथ रेप का निकला। सुनील कुमार भद्रन नाम के आरोपी ने 13 साल की बच्ची के साथ 2017 में बलात्कार किया था। 

इस मामले में सबसे दुखद पहलू ये है कि बच्ची ने आत्महत्या कर ली। आरोपी का इंटरपोल इश्यु होने के बाद भी 2 साल तक उन्हें लाने में पुलिस नाकाम रही थी। इस बात की जानकारी लगने के बाद मेरिन ने यह केस अपने हाथों में लिया और फिर से इंटरपोल अरब, इंडियन एम्बेसी, इंटरनेशनल इन्वेस्टीगेशन सेल जैसे एजेंसियों से संपर्क किया। 


बच्ची के आरोपी को पकड़ने के लिए मेरिन ने दिन-रात एक कर दिया। आखिरकार खुद सऊदी अरब पहुंचकर आरोपी को पकड़कर ही दम लिया, जिसके बाद वह आरोपी को पिछले रविवार भारत घसीटकर लाई। 

आरोपी को सऊदी से लाकर मेरिन ने देश को बता दिया एक बच्ची के साथ दुष्कर्म कोई छोटा केस नहीं होता। बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म/ बलात्कार का ऐसा कोई पैमाना नहीं है जो तय कर सके कि ये केस छोटा है या बड़ा। देश में मेरिन जैसे पुलिस ऑफीसर हो जाए तो शायद बच्चियों के साथ ये घटनाएं होने से बच जाए।

Saturday, July 13, 2019

पिता की लाड़ली का वकील बना मीडिया!




सुरभि भावसार


बचपन में माता-पिता ने हाथ पकड़कर चलना सिखाया, बड़े हुए तो स्कूल भेज पढ़ाया-लिखाया, हर शौक पूरे किए, एक बार बोलने पर हर चीज हाजिर कर दी, आज वहीं बच्चे बड़े होकर दुनिया के सामने उन्हें गलत बता रहे हैं। आज प्यार इतना जरुरी हो गया है कि माता-पिता को ही जान का दुश्मन बताने लगे। भले ही भलाई के लिए मां ने फटकार लगाई हो, आज वह फटकार टॉर्चर बन गई। उस पिता ने कभी सोचा नहीं होगा कि उसके बच्चे बड़े होकर उसकी ही जगहंसाई कराएंगे।

मामला और कोई नहीं, भाजपा विधायक राजेश मिश्रा और उनकी बेटी साक्षी मिश्र का है। साक्षी ने अजितेश नाम के लड़के से प्यार किया और उस प्यार को अंजाम तक पहुंचाया। दोनों ने भागकर शादी कर ली। शादी के बाद साक्षी ने अपने पति के साथ वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। वीडियो में साक्षी अपने ही पिता से जान को खतरा बताती है और पुलिस से मदद की गुहार लगाती है।


वीडियो सामने आते ही कुछ न्यूज़ चैनल वाले इतनी हमदर्दी जताने लगते है कि उन्हें अपने स्टूडियो में बुला लेते है और दिनभर इसी मुद्दे पर लाइव चर्चा होने लगती है। लाइव कैमरे पर उनसे तमाम सवाल पूछे जाते है। यहां यह सवाल पूछ्ना गलत नहीं होगा कि क्या मीडिया का ऐसा करना सही है? क्या इससे समाज में सही संदेश जा रहा है? क्या भागकर शादी करने वालों की मदद अव मीडिया करेगा?

यहां बात गैर जाति में शादी करने की नहीं है। बात है गलत तरीके से शादी करने की, बात है तो मां-बाप के खिलाफ जाकर, उनके आशीर्वाद के बिना शादी करने की, बात है तो वीडियो डालकर उनकी जगहंसाई करने की। किसी का ये कदम उसके सच्चे प्यार की निशानी नहीं बल्कि ड्रामा है। एक लड़के को भी किसी की बेटी को भगाने से पहले सौ बार सोचन चाहिए।


साक्षी और अजितेश ने तो अपने मन की कर ली और कुछ मीडिया वाले  इस काम में उनका पूरा साथ दे रहे हैं। उनके वकील बनकर खड़े हो गए है लेकिन क्या किसी ने उस पिता के बारे में सोचा है जिसके लिए इससे बड़ी पीड़ा और कोई हो ही नहीं सकती। क्या बीत रही होगी उस पिता पर जिसने अपनी बेटी को फूलों की तरह पाला और आज वहीं बड़ी होकर एक लड़के के लिए उन्ही के खिलाफ खड़ी हो गई हो।

न्यूज़ चैनलों पर साक्षी को लेकर तमाम नौटंकियां चल रही है, हर कोई उसके पिता राजेश मिश्रा को कोस रहा है लेकिन किसी ने उसके पिता की आवाज नहीं सुनी। साखी के पिता ने कहा है 'मैं ना तो जात-पात में विश्वास रखता हूं और ना ही शादी के खिलाफ हूं। मेरी फिक्र भी हर पिता की तरह ही है।  वह लड़का ना ही कुछ कामाता है और ना ही कुछ काम करता है। इसके अलावा वह साक्षी ने 9 साल बड़ा है। मुझे साक्षी के भविष्य की चिंता है। मेरी जगह कोई और पिता होता तो वह भी ऐसे ही सोचता।'

इसके बाद हाल ही में इस मामले में नया ट्विस्ट आया है। सोशल मीडिया पर अजितेश की एक फोटो वायरल हो रही है, जिसको लेकर कहा जा रहा है कि अजितेश की सगाई भोपाल की रहने वाली एक लड़की से हुई थी। शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई थी। हालांकि बाद में ये सगाई तोड़ दी गई।

ऐसे में एक पिता की चिंता करना क्या गलत है? क्या माता-पिता का बेटी को गलत रास्ते पर जाने से रोकना गलत है? क्या एक बेटी का माता-पिता को पूरे देश के सामने इस तरह जलील करना सही है? कुछ चैनल टीआरपी के चक्कर में लगातार एक पिता का मानसिक रूप से शोषण कर रहे है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी  'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओं' का संदेश देते हुए नजर आ रहे है, वहीं कुछ चैनल अप्रत्यक्ष तौर पर 'बेटी भागाओं, मीडिया के सामने आओ' जैसी विकृत मानसिकता को जन्म दे रहे है।

क्या एक पिता को अपनी बेटी के सही-गलत के बारे में सोचने का अधिकार नहीं है? हर पिता की हसरत होती है कि जब बेटी जवान हो जाए तब उसकी शादी एक अच्छे घर में हो और उसके सुसराल में उसे कोई तकलीफ ना हो। इसी सोच के भार से पिता अपनी पूरी जिंदगी बेटी के लिए कुर्बान कर देता है। यही इच्छा विधायक जी की भी थी लेकिन साक्षी ने अपने पिता के इन सपनो को चूर-चूर कर दिया।

हालांकि किसी लड़की को भी अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार है। शायद यही सोचकर साक्षी ने भी भागकर शादी की और जान का खतरा होने पर मीडिया के सामने भी आई और इलाहबाद हाईकोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगाई, जिसके बाद साक्षी को सुरक्षा भी मिली और मीडिया का समर्थन भी। वहीं विधायक मिश्रा भी कह चुके है कि साक्षी को जहां रहना है रहे लेकिन खुश रहे। जिसके बाद अब साक्षी को भी इस तरह अपने माता-पिता की जगहंसाई करवाना बंद कर देना चाहिए और चैन से अपने ससुराल वालों के साथ रहना चाहिए। 



Wednesday, July 10, 2019

कर्नाटक में राजनीतिक दलों का 'कर-नाटक', जनता परेशान



सुरभि भावसार 

कर्नाटक का नाटक एक बार फिर शुरू हो गया है। इस्तीफों का दौर और सियासी उठा-पटक के बीच किसी का ध्यान उस जनता की तरफ नहीं जा रहा जिसनें इन नेताओं को यहां पहुंचाया है। जनता के 'स्वामी' बन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे कुमारअब केवल अपनी कुर्सी बचाने में लगे हुए है। इसके साथ ही पिछले दरवाजे से राज्य की सत्ता में आई कांग्रेस को भी सत्ता की भूख सता रही है। कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही पार्टियां चुनाव के समय जनता से किए तमाम वादें भूल गई। 

हालांकि ऐसी स्थिति कर्नाटक में पहली बार नहीं बनी है। इससे पहले भी राज्य में सियासी नाटक हुए है। बात करें विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने की तो उस समय भी भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी लेकिन बहुमत साबित नहीं पाई और सत्ता से हाथ धोना पड़ा। इधर कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस ने राज्य में अपनी सत्ता बना ली।

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सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही भाजपा ने राज्य में 'ऑपरेशन लोटस' चलाया और गठबंधन पर ख़तरा मंडराने लगा था। कांग्रेस और जेडीएस के बीच चल रहे मतभेदों के बीच दो निर्दलीय विधायकों ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी थी और भाजपा को समर्थन देने के लिए राज्यपाल को पत्र भी लिखा दिया था। हालांकि कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा था कि कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार को कोई खतरा नहीं है। सरकार को बहुमत के लिए 113 विधायक चाहिए, जबकि सरकार के पास बसपा विधायक को मिलाकर कुल 117 विधायकों का समर्थन हासिल है।

कुमारस्वामी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल यही ख़त्म नहीं हुए। लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखी मोदी की सुनामी का असर भी कर्नाटक की राजनीति पर देखने को मिला। भीषण पराजय देखने के बाद जेडीएम के प्रदेश अध्यक्ष एच विश्‍वनाथ ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया। 

ऐसी स्थिति में यह बात सामने आ रही है कि जिस विकास के मुद्दे पर राज्य की जनता ने पार्टियों को जनादेश दिया था, ताकि वे प्रदेश के लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और राज्य का विकास कर सके लेकिन इसके विपरीत प्रदेश में सियासी उठा-पटक जारी है और राज्य का विकास न होकर राजनीतिक दलों का विकास जारी है, जिससे जनता खुदको ठगा महसूस कर रही है।

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इधर भाजपा भले ही खुलकर सामने नहीं आ रही है लेकिन अंदर ही अंदर सरकार बनाने के प्रयास तेज कर दिए है जिसका अंदाजा हाल ही में आए भाजपा नेताओं एक बयानों से लगाया जा सकता है। बीजेपी की हमेशा से ही कोशिश रही है कि कांग्रेस के 13 विधायक इस्तीफा दे दे और वह दो निर्दलीयों की मदद से बहुमत साबित कर सके। 

अब सवाल ये है कि कर्नाटक में लगातार हो रही सियासी उठा-पटक के बीच जनता की स्थिति क्या है? जनता ने भरोसा कर जिसे वोट दिया वो अब सिर्फ कुर्सी बचाने में लगे हुए है। बार-बार होने वाली इस सियासी ड्रामे में सत्ता बचाने के चक्कर में नेता जनता से किए वो तमाम वादें भूल गए है। क्या जनता अब ऐसे नेताओं पर दोबारा विशवास करेगी? यहां ये कहा जा सकता है कि जनता को बहुमत के साथ किसी एक सरकार को चुनना चाहिए, जिससे राज्य में सरकार गिरने की स्थिति न बनें और विकास कार्य भी चलता रहे। 








Friday, July 5, 2019

आम आदमी को मिला सिर्फ 'धन्यवाद'?, कितना सही, कितना गलत



सुरभि भावसार 

प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता में आई मोदी सरकार ने अपने पहले बाजार में किसानों और गांव पर सबसे ज्यादा फोकस किया। शिक्षा, व्यापार, किसान, विकास और महिलाओं के लिए बजट में कई ऐलान हुए। हालांकि बजट को लेकर कहा जा रहा है कि आम आदमी का हाथ खाली रह गया है। मोदी सरकार ने आम आदमी को सिर्फ धन्यवाद दिया है लेकिन ऐसा नहीं है। बजट को ध्यान से देखा जाए तो सरकार ने आम आदमी झोली में भी बहुत कुछ डाला है।

ये बात बिलकुल भी गलत नहीं है कि मिडिल क्लास की नजर टैक्स स्लैब पर थी और सरकार ने टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया है। आपकी इनकम 2 लाख हो या 10 लाख, आम आदमी को इसमें कोई राहत नहीं मिली है।

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अब यदि टैक्स से हटकर देखा जाए तो वित्त मंत्री ने आम आदमी के लिए कई ऐलान किए है। सरकार ने घर खरीदने वालों को रहत देते हुए हाउसिंग लोन में 3.5 लाख रुपये की छूट दी है। पहले यह छूट 2 लाख रुपये थी। इसके साथ ही 45 लाख का घर खरीदने पर 1.5 लाख तक की छूट मिलेगी।

इतना ही नहीं सरकार ने  ई-वाहन पर लगने वाले 12 फीसदी GST को घटाकर 5 फीसदी कर दिया है। साथ ही इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदने के लिए जो लोन लिया गया है उस पर दिए जाने वाले ब्याज पर 1.5 लाख रुपए की अतिरिक्त आयकर छूट मिलेगी।

सरकार ने भले ही 2 करोड़ से 5 करोड़ और 5 करोड़ से ऊपर की व्यक्तिगत आय पर 3 फीसदी और 7 फीसदी अतिरिक्त टैक्स लगाया है लेकिन अभी तक जिन कंपनियों का टर्नओवर 250 करोड़ रुपए था उन्हें 25 फीसदी टैक्स देना होता था। अब सरकार ने व्यापारियों को बड़ी राहत दी है और 400 करोड़ रुपए सालाना आय वाली कंपनियों को 25 फीसदी टैक्स देना होगा।

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युवाओं के लिए स्टार्ट अप की बात करें तो सरकार ने यहां भी ध्यान दिया है। स्टार्ट अप करने वालों को एंजल टैक्स से मुक्ति दे दी है। साथ ही शुरूआती तीन साल तक आयकर विभाग कोई दबाव नहीं बनाएगा।

महिलाओं का भी इस बजट में खास ध्यान रखा है। मुद्रा योजना के तहत महिलाओं को एक लाख रुपये तक का लोन दिया जाएगा। अब तक महिलाएं अपने जनधन खाते से सिर्फ 2 हजार रुपये ही निकाल सकती थीं, जिसे बढ़ाकर अब 5 हजार रुपये कर दिया गया है।

इन सब बिंदुओं पर नजर डाले तो आम आदमी को घर, गाड़ी और स्टार्ट अप के लिए सरकार ने बहुत कुछ दिया है। गरीबों से लेकर अमीरों तक की झोली में सरकार ने कुछ न कुछ डाला है। इन सब बिंदुओं को देखने के बाद कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने आम आदमी को सिर्फ 'धन्यवाद' ही नही दिया है।

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Wednesday, July 3, 2019

राहुल के इस्तीफे पर 'जय श्री राम'



सुरभि भावसार 

पहले पेशकश, फिर शर्तों के साथ पद पर बने रहता, फिर मनाने का दौर, फिर धरने की नौटंकी और आखिर में इस्तीफा। तमाम सम्झाईशें और गुजारिशे भी काम नहीं आई और आखिर में आज राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया है। ट्विटर पर 4 पन्नों की चिट्ठी लिखकर राहुल गांधी ने अपनी बात कही। वजह भी बताई, तरीका भी सुझाया और मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। 

राहुल गांधी ने चिट्ठी में अपने इस्तीफे की वजह भी बताई। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी को मिली करारी हार की जिम्मेदारी मेरी है। पार्टी के विकास के लिए जवाबदेही महत्वपूर्ण है, मैं हार की जिम्मेदारी लेता हूं और इसी कारण मैं अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं। हालांकि आगे उन्होंने लिखा कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहना मेरे लिए गर्व की बात है। 


पार्टी को सुझाव देते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मैंने इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी को सुझाव दिया है कि वह कुछ लोगों यह जिम्मेदारी दें और वह एक नए अध्यक्ष का चुनाव करें। मैं इस काम में उनका पूरा सहयोग करूंगा। मेरा संघर्ष कभी बेकार नहीं जाएगा। भाजपा का मैंने हमेशा विरोध किया है और आखिरी दम तक भाजपा की विचारधारा का विरोध करता रहूंगा। मेरा यह विरोध निजी नहीं बल्कि भारत की विचारधारा के आधार पर है। मैं कांग्रेस का एक वफादार सैनिक हूं और भारत माता का सच्चा सपूत भी। ऐसे में देश को बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ता रहूंगा।

जब उनसे नए अध्यक्ष का नाम पूछा गया तो उन्होंने इससे भी इनकार कर दिया। राहुल ने लिखा कि उनके कुछ सहयोगियों का कहना है कि वे पार्टी के किसी ठीक नेता को आगे के नेतृत्व के लिए नामित करें लेकिन मेरे लिए इस हालत में अगले नेतृत्व का चयन करना सही नहीं होगा। हमारी पार्टी का इतिहास पुराना है। यह एक विचारधारा वाली पार्टी है और मैं उसका सम्मान करता हूं। ऐसे में मुझे पूरा विश्वास है कि पार्टी किसी एक अच्छे नेता का चुनाव करने में पूरी तरह से सक्षम है जो पार्टी को मजबूत नेतृत्व दे सकता है।

वहीं  राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पक्ष-विपक्ष की तमाम प्रतिक्रिया भी आपने लगी है। अमेठी में राहुल गांधी को मात देने वाली केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जब इस बारे में पूछा तो वह 'जय श्री राम' कहकर चली गईं। फिलहाल पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष मोतीलाल वोरा होंगे। 


राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पार्टी गांधी मुक्त तो गई है लेकिन अब सवाल ये भी उठ रहे है कि राहुल गांधी मैदान से भाग क्यों रहे हैं? अब पार्टी किसे यह जिम्मेदारी सौंपेगी? क्या नया अध्यक्ष पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह भर पाएगा? क्या पार्टी को फिर से खड़ा पाएगा? खैर इन तमाम सवालों के जवाब तो आगे ही मिल पाएंगे लेकिन पार्टी के नेता राहुल गांधी को नहीं मना सके। 


Monday, July 1, 2019

अमरनाथ यात्रा: सुरक्षा चाक-चौबंद, 26 साल में 14 हमले और 68 मौतें



'हर-हर महादेव' का नारा और आतंकियों का साया। पवित्र अमरनाथ यात्रा आज से शुरू हो गई है। एक जुलाई से शुरू होकर 15 अगस्त तक चलने वाली इस यात्रा में सरकार के लिए सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान के साथ सख्त रूप अपनाए हुए और घाटी में आतंकियों के सफाए के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशन आलआउट के तहत सुरक्षाबलों ने अब तक 140 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया है।

पुलवामा में हुए बड़े आतंकी हमले और हाल ही में अनंतनाग में हुए आतंकी हमले के बाद अमरनाथ यात्रा पर खतरे के बादल और भी गहरे हो गए है। इसके अलावा राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने है, ऐसे में आतंकी किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते है। इसके अलावा ख़ुफ़िया इनपुट से बालटाल रूट पर आतंकियों को निशाना बनाने की आशंका मिली है। इन सब खतरों के बाद सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है।

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वैसे तो हर साल ही अमरनाथ यात्रा पर आतंकी साया मडराता है लेकिन इस बार आतंक के खिलाफ भारत के सख्त रूप को देखते हुए इस बार अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा कड़ी चुनौती बनी हुई है।

कब-कब अमरनाथ यात्रियों पर हुआ हमला-

1993 में आतंकियों ने पहली बार अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया था। इसके बाद सबसे ताजा हमला 2017 में अमरनाथ यात्रियों की बस को निशाना बनाया गया था। 1993 से अभी तक 26 सालों में अमरनाथ यात्रियों पर 14 हमले हो चुके है जिसमें 68 लोगों की जान गई है।

1993

1993 में हुई अमरनाथ यात्रा पर पहला आतंकी हमला हुआ था। इस साल हुए दो आतंकी हमलों में दो यात्रियों ने जान गंवा दी थी। यह यात्रा पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन हरकत उल अंसार और लश्कर ए तैय्यबा की धमकियों के बीच हुई थी।

1994

19 94 में हुई अमरनाथ यात्रा में भी आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया। इस हमले में दो यात्रियों की जान चली गई।

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1995

इस साल हुई अमरनाथ यात्रा पर तीसरा आतंकी हमला हुआ। इस दौरान तीन आतंकी हमले हुए। गनीमत ये रही कि किसी भी यात्री की जान नहीं गई।

1996

1996 में हुई अमरनाथ यात्रा के दौरान दो आतंकी हमले हुए। हालांकि इस दौरान सभी यात्री सुरक्षित रहे।

2000

2000 में हुई अमरनाथ यात्रा पर घात लगाए आतंकियों ने सबसे बड़ा हमला किया। 2 अगस्त 2000 को आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों के पहलगाम बेस कैंप में अंधाधुंध फायरिंग की। इस हमले में 32 श्रद्धालु, स्थानीय दुकानदार और पोर्टरों की जान गई। आतंकियों की इस खूनी साजिश में 60 लोग घायल भी हुए थे। अमरनाथ यात्रा पर हुआ आतंकी हमलों में यह सबसे बड़ा हमला था।

2001

सबसे बड़े आतंकी हमले के एक साल बाद फिर 20 जुलाई 2001 को आतंकियों ने पहलगाम बेस कैंप से आगे शेषनाग लेक के पास अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाया। आतंकियों ने यात्रियों के कैंप पर हथगोले फेंके. जिसमें 12 लोगों की मौत हुई और 15 लोग घायल हुए थे।

2002

30 जुलाई 2002 को आतंकियों ने फिर अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाते हुए टैक्सी पर हमला कर दिया। आतंकियों ने श्रीनगर से अमरनाथ यात्रा के लिए जा रहे  श्रद्धालुओं की प्राइवेट टैक्सी पर हमला किया। इस हमले में दो यात्रियों की मौत हो गई और दो लोग घायल हुए। इसके बाद 6 अगस्त 2002 को आतंकियों ने पहलगाम के ननवान कैंप के पास ग्रेनेड फेंका और गोलीबारी की। इस आतंकी हमले में 9 लोगों की मौत और 27 लोग घायल हुए थे।

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2006

20०६ में आतंकियों ने अमरनाथ यात्रियों की बस पर ग्रेनेड फेंका। इस हमले में एक यात्री की मौत हो गई थी।

2017

करीब 11 साल तक शांति से हुई अमरनाथ यात्रा के बाद 10 जुलाई 2017 को आतंकी एक बार फिर अमरनाथ यात्रियों को निशाना बनाने में कामयाब हो गए। आतंकियों ने अनंतनाग में यात्रियों की बस पर अंधाधुंध फायरिंग की। आतंकियों के इस हमले में 7 यात्रियों की मौत हो गई और 32 लोग घायल हो गए।

हालांकि आतंकियों के खोइफ्नक मंसूबे इसलिए भी कामयाब हो गए थे क्योकि यात्रियों की ये बस सुरक्षाबलों के आधिकारिक काफिले का हिस्सा नहीं थी। सुरक्षाबलों ने इस हमले में शामिल आतंकी मॉड्यूल के खिलाफ कई ऑपरेशन चलाए और 60 दिन के अंदर पूरे आतंकी मॉड्यूल का सफाया कर दिया।

Monday, June 24, 2019

परिवारवाद की जद में 'माया'



सुरभि भावसार 

राजनीति में परिवारवाद का लंबे समय से विरोध करने वाली आज खुद परिवारवाद की जद में है। खुद को परिवारवाद से दूर बताने वाली बसपा की मुखिया मायावती की पार्टी में अब भाई-भतीजावाद नजर आने लगा है। मायावती के इस फैसले ने साफ़ कर दिया है कि अब बसपा में परिवारवाद का सीधा दखल होगा। 

रविवार को बड़ा फैसला लेते हुए मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा भतीजे आकाश आनंद को नेशनल को-आर्डीनेटर नियुक्त किया है। मायावती का यह फैसला तमाम सवालों को जन्म दे रहा है कि क्या अब तक परिवारवाद से दूर रही बसपा भी अब परिवारवाद की राजनीति करेगी? क्या बसपा को आगे बढ़ाने के लिए मायावती को कोई बाहर का सदस्य नहीं मिला? 


इतना ही नहीं बसपा को परिवारवाद का रंग देने वाले मायावती के इस फैसले ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम का भी अपमान किया है। कांशीराम ने बसपा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के किसी सदस्य को आगे नहीं किया और मायावती का नाम आगे बढ़ाया।  

चुनाव से पहले मायावती ने ये फैसला इसलिए नहीं लिया क्योकि उन्हें इस बात का डर था कि उनके उपर भाई-भतीजावाद की राजनीति करने का आरोप लगेगा। 

मायावती के इस फैसले के पीछे गौर किया जाए तो एक कारण यह भी है कि वह पार्टी के जरुरी मसलों पर बाहरी लोगों पर भरोसा नहीं कर सकती। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए भी वह किसी बाहरी व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहती। इसका भी कारण है कि उन्होंने राजनीती में जिस भी करीबी व्यक्ति पर भरोसा किया उसने विपक्ष का दामन थाम लिया। 


इतिहास पर नजर डाले तो स्वामी प्रसाद मौर्या एक समय मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते थे लेकिन उन्होंने हाथी का साथ छोड़ भगवा गमछा ओढ़ लिया। इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकीभी मायावती का साथ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए। 

इसके अलावा एक अहम् कारण है मायावती की बढती उम्र। 60 साल की उम्र पार कर चुकी मायावती को अब विरासत की भी चिंता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि बसपा में उनका उत्तराधिकारी कोई दलित या मुस्लिम ही हो सकता है लेकिन भाई और भतीजे को अहम् जिम्मेदारी देने के बाद क्या ये मां लिया जाए कि मायावती ने नया चेहरा खोज लिया है जिस पर वह भरोसा कर सके?