Friday, May 31, 2019

सेल्स गर्ल का काम करती थीं यह मंत्री, आज हाथों में है देश के खजाने की चाबी




मोदी कैबिनेट में हुए मंत्रियों के कामकाज के बंटवारे में रक्षामंत्री रही निर्मला सीतारमण को एक बार फिर अहम् जिम्मेदारी मिल गई है। देश के इतिहास में दूसरी माहिला रक्षामंत्री रही निर्मला सीतारमण अब देश की पहली महिला वित्त मंत्री बन गई है। अपने पहले ही कार्यकाल में निर्मला काफी एक्टिव रहीं और राफेल के मुद्दे पर संसद में और बाहर सरकार का पक्ष रखा।

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सेल्स गर्ल का करतीं थीं काम

तमिलनाडु के साधारण परिवार में 18 अगस्त 1959 को जन्मी निर्मला सीतारमण का जीवन काफी संघर्ष भरा रहा। उनके पिता रेलवे में काम करते थे और मां घर संभालती थी। पिता का बार-बार ट्रांसफर होने के कारण उन्हें तमिलनाडु के कई हिस्सों में रहना पड़ा। किसी समय सीतारमण ने सेल्स गर्ल के तौर पर भी काम किया।

JNU से की पढ़ाई

निर्मला सीतारमण की शुरुआती पढ़ाई तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुई। मास्टर डिग्री उन्होंने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से ली। इसके बाद उन्होंने इंडो-यूरोपियन टेक्सटाइल ट्रेड में पीएचडी की रिसर्च की।

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लंदन में थीं सेल्स गर्ल

निर्मला सीतारमण ने पढ़ाई के दौरान कई जगह काम करने के साथ ही शादी के बाद भी काम किया। शादी के बाद जब वह लंदन में रहती थीं तो वहां उन्होंने घर के सजावटी सामान बेचने वाली दुकान में सेल्स गर्ल का काम किया था।

इसके बाद वह लंदन में कृषि इंजिनियर्स असोसिएशन से जुड़ीं। फिर उन्होंने लंदन में ही प्राइस वॉटरहाउस नाम की कंपनी में सीनियर मैनेजर के तौर पर काम किया। वापस भारत आने पर उन्होंने हैदराबाद में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में डेप्युटी डायरेक्टर के रूप में काम किया।

2008 में ज्वाइन की भाजपा

साल 2008 में सीतारमण ने भाजपा ज्वाइन की और दो साल बाद ही पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनीं। 2014 में पूर्ण बहुमत से आई मोदी सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का पद सौंपा। इसके बाद 3 दिसंबर 2017 को उन्हें रक्षा मंत्रालय का कार्यभार सौंप दिया गया।

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बना लिया रिकॉर्ड

रक्षा मंत्री बनते ही निर्मला सीतारमण ने एक रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। वह देश की दूसरी महिला रक्षा मंत्री बनी थी। उनसे पहले सिर्फ इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार में इस मंत्रालय का जिम्मा लिया था।




Thursday, May 30, 2019

बचपन में मरने के लिए छोड़ दी गई थीं, आज बुलंदियों के शिखर को छू रही स्मृति ईरानी




आज यानी 30 मई को नरेंद्र मोदी की दूसरी बार ताजपोशी होने वाली है। मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में करीब 8 हजार मेहमानों के साथ ही फिल्म जगत की कई हस्तियां भी शामिल होंगी। राष्ट्रपति भवन में होने वाले शपथ ग्रहण में मोदी के साथ कई मंत्री भी शपथ लेंगे। इन मंत्रियों में एक नाम स्मृति ईरानी का भी है, जो इस बार कांग्रेस के गढ़ में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को हराकर लोकसभा पहुंचीं है।

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कभी रेस्टोरेंट में सफाई करने को मजबूर थी स्मृति

मॉडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली स्मृति ईरानी ने 1998 में मिस इंडिया प्रतियोगिता में हिस्सा लिया लेकिन फाइनल तक नहीं पहुंच पाई। इसके बाद स्मृति ने मुंबई जाकर एक्टिंग में करियर बनाने की कोशिश की। यहां उन्हें काम नहीं मिला और अपना खर्च चलाने के लिए उन्हें एक रेस्टोरेंट में सफाई का काम तक करना पड़ा।

मैकडॉनल्ड में किया वेटर का काम

स्मृति ईरानी अज जिन बुलंदियों पर पहुंचीं है उसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। एक जमाने में पेट भरने के लिए स्मृति ने मैकडॉनल्ड में वेटर का काम किया। स्मृति को य बुलंदियां नसीब से नहीं बल्कि अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर मिली है।

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मरने के लिए बिना कपड़े जमीन पर लिटा दिया था

दिल्ली में जन्मी स्मृति ईरानी एक मध्यमवर्गीय परिवार से थीं। रूढ़िवादी पंजाबी-बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाली स्मृति ने परिवार की बंदिशों को तोड़कर ग्लैमर की दुनिया में कदम रखा था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि बेटी पैदा करने की वजह से उनकी मां को ताने दिए जाते थे। बचपन में वो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं।

इस हालत में परिवार की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें बिना कपड़ों के जमीन पर लिटा दिया था, ताकि वो मर जाएं। जब मां ने इसका विरोध किया तो उन्हें कहा गया कि बेटी है मर जाएगी तो तुम्हारी जिंदगी आसान होगी। हालांकि मां-बाप के प्रगतिशील होने की वजह से उन्हें बचाया गया और वो जिंदगी में आगे बढ़ पाईं। 

Tuesday, May 28, 2019

कांग्रेस का सियासी संकट



सुरभि भावसार 

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में उथल-पुथल चल रही है। हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की थी लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इसे नामंजूर कर दिया है। हालांकि राहुल गांधी अभी भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। अभी ये तो नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी के इस्तीफा देने से पार्टी कमजोर हो जाएगी या नया अध्यक्ष मिलने से मजबूत होगी लेकिन ये बात भी सभी जानते है कि 2014  में हर कोई कांग्रेस छोड़ने को तैयार था, उस समय राहुल ने अकेले के दम पर ही कांग्रेस को उभारा था। इसके अलावा राहुल गांधी के ही नेतृत्व में पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मात देने में सफल हो पाई है।

राहुल गांधी के इस फैसले के बाद उन्हें पार्टी के कई नेता मनाने पहुंचे लेकिन वह नहीं माने। जब पार्टी अध्यक्ष पद के लिए प्रियंका गांधी का नाम आया तो राहुल ने इससे भी मना कर दिया और कहा कि पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का होना चाहिए। प्रियंका को इन सबमे नहीं खींचे।

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सूत्रों की माने तो राहुल गांधी ने पार्टी आलाकमान को एक महीने का वक्त दे दिया और कहा कि एक महीने में नया अध्यक्ष खोज लें। हालांकि राहुल गांधी ने यह भी कहा है कि वह  लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करने को तैयार हैं और पार्टी में अन्य भूमिका में काम करते रहेंगे लेकिन अध्यक्ष पद पर नहीं रहना चाहते।

पार्टी में चल रहे इस सियासी संकट में पार्टी आलाकमान के सामने नया अध्यक्ष खोजना एक नई चुनौती बन गई है। अब देखना ये होगा कि आलाकमान नया अध्यक्ष खोजती है या राहुल गांधी को मनाने में कामयाब होती है।

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एक बात ये भी है कि राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर जो कुछ भी चल रहा है उसे अब लोग नौटंकी बताने लगे है। लोगों का कहना है कि राहुल गांधी को इस्तीफा देना है तो दे दें, ये बेवजह का दिखावा क्यों कर रहे है। वैसे भी इस्तीफा उन्हें ही देना है और स्वीकार भी खुद ही करना है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अब किसी की कोई रुचि नहीं है कि राहुल गांधी अध्यक्ष के पद पर है या नहीं।

हिंदुत्व को ओढ़ने की कोशिश और खुद को शिवभक्त बताने में पार्टी पहले ही अपना नुक्सान करवा चुकी है। अब राहुल के इस्तीफे का दिखावा पार्टी को नुक्सान के सिवा और कुछ नहीं देगा। कांग्रेस ये क्यों नहीं समझ पा रही है कि उनके झूठे खेल से लोगों का मन भर चुका है।

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Monday, May 27, 2019

हार को अवसर में बदलेगी कांग्रेस?



सुरभि भावसार

2019 के लोकसभा चुनाव में जहां बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता में लौट रही है। वहीं कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। अब पार्टी इस हार को एक बड़े अवसर के रूप में लेकर आगे बढ़ना चाहती है। खबर है कि कांग्रेस पार्टी बड़े फेरबदल की तैयारी में है, जिसके जरिए पार्टी लोगों के बीच यह संदेश देना चाहती है कि पुरानी पार्टी भी समय-समय पर बड़े बदलाव कर सकती है।

 हाल ही में पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि पार्टी ने इस हार की सामूहिक जिम्मेदारी ली है। अब आगे क्या किया जा सकता है और पार्टी के सामने क्या चुनौतियां होगी इस पर पार्टी मंथन कर रही है। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति एक ऐसा लोकतांत्रिक मंच है जहां विचार लिए और दिए जाते हैं, नीतियां बनाई जाती है और सुधार के लिए कार्रवाई की जाती है।

पार्टी चुनाव में मिली हार को एक बड़े अवसर के रूप में देख रही हैं ताकि पार्टी के संगठन स्तर पर बड़े बदलाव किए जा सके। इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पार्टी ने अधिकृत किया है। राजनीतिक गलियारों से जो खबर आई है उसमें यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी के इस फेरबदल में बहुत से महासचिवों और राज्य इकाई प्रमुख पर गाज गिर सकती है।

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वहीं पार्टी की हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश भी की थी जिसे नामंजूर कर दिया गया। साथ ही  राहुल गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में  कुछ नेताओं द्वारा उनके बेटों को चुनाव मैदान में उतारे जाने को लेकर नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अपने बेटों के हितों को पार्टी के हितों से आगे रखा।

वैसे देखा जाए तो कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी की महासचिव बनाई गई प्रियंका गांधी का पद भी खतरे में पड़ सकता है क्योकि प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया था, जहां कांग्रेस केवल एक ही सीट जीत पाई है। अब देखना तो यह होगा कि कांग्रेस इस हार को बड़े अवसर के रूप में लेकर पार्टी में कोई फेरबदल करती है या नहीं। पार्टी के लिए फेरबदल करना जरूरी भी है जिससे लोगों में कुछ अलग संदेश जा सके। 

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मां तो आखिर मां होती है


कभी डांटतीं है तो कभी गले लगा लेती है, हमारी खुशी में खुश होकर अपने गम भुला देती है, हां वह मां होती है। शायद यह मां की दुआओं का ही असर है कि नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। दोबारा प्रधानमंत्री  पद की शपथ लेने से पहले वह अपने मां का आशीर्वाद लेना अहमदाबाद पहुंचे थे।

 ऐसा कोई त्यौहार नहीं, कोई बड़ा मौका नहीं जब मोदी अपनी मां का आशीर्वाद लेने नहीं पहुंचे हो। अपने कामों में व्यस्त रहने के बाद भी वह अपनी मां की सेहत का पूरा ध्यान रखते हैं। कोई भी बड़ा मौका हो वह पहले अपनी मां के पास पहुंचकर उनका आशीर्वाद  लेना नहीं भूलते। शनिवार को भी मोदी अपनी मां का आशीर्वाद लेने गुजरात गए थे।
 इससे पहले जब उन्होंने वाराणसी से अपना नामांकन भरा था तब भी अपनी मां का आशीर्वाद लिया था। इसके अलावा 2014 लोकसभा चुनाव के बाद अपनी मां का आशीर्वाद लेकर ही दिल्ली गए थे। आज भी मोदी अपने जन्मदिन पर सबसे पहले अपने मां के पास जाते हैं।

 जब भी वह अपनी मां के पास जाते हैं तो प्रधानमंत्री बनकर नहीं बल्कि बेटा बनकर जाते हैं। उनकी मां से वह कितना प्यार करते हैं इस बात का अंदाजा तो तभी लग जाता है जब वह अपनी मां और उनके संघर्षों के बारे में बताते हैं तो उनकी आंखें भर आती है।

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 लबों पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, वह मां ही है जो कभी खफा नहीं होती। हीराबेन अपने बेटे नरेंद्र मोदी को अपनी आंख का तारा मानती है। जब वह उनसे मिलने जाते हैं तो उन्हें कुछ ना कुछ जरूर देतीं हैं। मोदी  अपनी मां से मिले सवा रुपये को सवा सौ करोड़ देशवासियों का आशीर्वाद मानते हैं। आज मोदी जिन बुलंदियों को छू रहे है वह भी उनकी मां के आशीर्वाद का ही कमाल है।

Saturday, May 25, 2019

पहले संसद को नमन, अब संविधान को प्रणाम



सुरभि भावसार

 2014 लोकसभा चुनाव में भारी मतों से जीतकर जब मोदी पहली बार संसद भवन पहुंचे थे तब संसदीय इतिहास में पहली बार वह तस्वीर देखने को मिली थी जिसने सभी को चौंका कर रख दिया था। उस समय कुछ ऐसा हुआ था जो किसी ने सोचा भी नहीं था।

  जी हां जब मोदी जब पहली बार संसद भवन पहुंचे थे तो उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर के द्वार पर सिर झुकाकर आशीर्वाद लिया था और आज जब दूसरी बार शानदार बहुमत से संसद भवन पहुंचे तो संविधान को प्रणाम किया। यह दोनों तस्वीर देश के इतिहास में शायद ही पहले कभी देखी गई हो।

 वही 2019 में जीत का प्रमाणपत्र लेने के बाद जब नवनिर्वाचित सांसद लोकतंत्र के इस मंदिर में पहुंचे तो सीढ़ियों को सिर झुकाकर प्रणाम किया। सबसे ज्यादा खुशी उन सांसदों के चेहरे पर देखने को मिली जिन्होंने पहली बार जीत का स्वाद चखा।

 बेंगलुरु साउथ से जीतकर भाजपा के सबसे युवा सांसद तेजस्वी सूर्या संसद भवन पहुंचे थे उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों को चूम कर उसे प्रणाम किया।

यूं तो है अमीर पर जनादेश में गरीब



लोकसभा चुनाव 2019 में मिले जनादेश में देश के 10 सबसे अमीर उम्मीदवारों में से केवल पांच उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर पाए है। वही इन धनी उम्मीदवारों में जो पहले नंबर पर थे उन्हें भी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है।

चुनावी रण में उतरे टॉप 10 अमीर उम्मीदवारों में 3 आंध्र प्रदेश, 2 बिहार, 2 मध्य प्रदेश, 1 तमिलनाडु, 1 कर्नाटक और 1 तेलंगाना से हैं। जीतें हुए अमीर प्रत्याशियों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ का नाम शामिल है। वही हारने वाले अमीर उम्मीदवार में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम है।

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यहां जाने इन 10 अमीर उम्मीदवारों की हार-जीत के बारे में- 

देश के सबसे अमीर उम्मीदवारों में पहला नाम है रमेश कुमार का। बिहार की पाटलीपुत्र लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव  लड़े महेश शर्मा ने नामांकन पत्र में अपनी संपत्ति 1107 करोड़ रुपये बताई थी। उन्हें चुनाव में सिर्फ 1556 वोट ही मिले।

तेलंगाना की चेवेल्ला सीट से टीआरएस प्रत्याशी कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी देश के दूसरे सबसे अमीर उम्मीदवार थे। इन्हें भी रंजीत रेड्डी ने 14,317 वोटों से हरा दिया। उन्होंने 895 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति की घोषणा की थी।

तीसरे नंबर पर आते है मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ। नकुलनाथ मप्र की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे। यहां उन्होंने बीजेपी के नत्थन शाह को 37,536  वोटों से हराया। उन्होंने 660 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति बताई थी।

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तमिलनाडु की कन्याकुमारी सीट से चुनाव लड़े कांग्रेस के एच वसंताकुमार  417 करोड़ रुपये की संपत्ति  के साथ चौथे सबसे अमीर उम्मीदवार थे। उन्होंने  2,59,933 वोटों के अंतर से केंद्रीय मंत्री पोन राधाकृष्णन को हराया .

374 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया देश के पांचवें सबसे अमीर प्रत्याशी थे। सिंधिया अपने ही गढ़ यानी गुना से 1,25,549 वोटों से हार गए। उनका मुकाबला भाजपा के केपी यादव से था।

वाईएसआर कांग्रेस के टिकट पर विजयवाड़ा सीट से चुनाव मैदान में उतरे वीरा पोटलूरी अमीर उम्मीदवारों में छठे नंबर पर आते है। उन्होंने 347 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी लेकिन चुनाव में 8,726 वोटों से टीडीपी उम्मीदवार से हार गए।

सातवें सबसे अमीर उम्मीदवार की बात करे तो वह है कांग्रेस के उदय सिंह। बिहार की पूर्णिया सीट से चुनाव लड़े उदय सिंह 2,63,461 वोटों से हार गए। उन्होंने 341 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई थी।

कांग्रेस उम्मीदवार डीके सुरेश का नाम आठवें नंबर पर आता है। बेंगलुरु ग्रामीण से चुनावी रण में उतरे डीके सुरेश ने 2,06,870 वोटों से जीत हासिल की। उन्होंने 338 करोड़ की संपत्ति घोषित की थी।

नौवें नंबर पर आते है वाईएसआर कांग्रेस के केआरके राजा। इनकी कुल संपत्ति 325 करोड़ रुपये की है। इन्होने 31,909 वोटों से जीत हासिल की है।

सबसे आखिरी में आते है जयदेव गल्ला। आंध्र प्रदेश की गुंटूर सीट से 4,205 वोटों से जीत हासिल की। उन्होंने 305 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी।

Friday, May 24, 2019

महानायक + महाविजय + महोत्सव = मोदी




सुरभि भावसार 

पूरा हिंदुस्तान एक बार फिर भगवामय हो गया है। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा की महाविजय का श्रेय केवल महानायक मोदी और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह को जाता है।  2019 में चली मोदी की सुनामी के सामने विपक्ष तिनके की तरह बिखर गया और यूपीए केवल 95 सीटों पर ही सिमट गई।

भाजपा को मिले इस जनादेश के बाद एक बार फिर माहौल मोदीमय हो गया है और हर तरफ मोदी-मोदी के नारे लग रहे है। चुनाव में भाजपा ने अपने 'अबकी बार 300 पार' के नारे को सच कर दिखाया है।

जीत के बाद जब मोदी भाजपा मुख्यालय पहुंचे तो भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ इंद्र देव भी स्वागत के लिए पहुंच गए। बारिश की बूंदों के बीच मोदी वहां कार्यकर्ताओं से मिले। मोदी ने यह प्रचंड जनादेश देश की जनता को समर्पित कर उन्हें धन्यवाद भी दिया और कहा कि मेरे समय का पल-पल, मेरे शारीर का कण-कण देश के लिए समर्पित है।

मोदी की इस जीत के चर्चे केवल देश की मीडिया में ही नहीं हो रहे बल्कि विदेशी मीडिया में भी मोदी छा गए है। अमेरिका हो, चीन हो या फिर पाकिस्तान हर देश की मीडिया ने मोदी की जीत को सराहा है। इतना ही नहीं विदेशी नेताओं ने फोन कर  मोदी को जीत की बधाई भी दी है।

वाराणसी से चार लाख से ज्यादा वोटों से जीतने के बाद मोदी ने ट्वीट कर काशीवासियों को धन्यवाद दिया। उन्होंने लिखा कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने जो कठिन परिश्रम किया है, इसके लिए उन सबका आभार। लोकसभा में एक बार फिर काशी का प्रतिनिधित्व करने को लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं। काशी के विकास के लिए हम सब मिलकर काम करेंगे।

नतीजों के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल है। जीत की ख़ुशी में कहीं मिठाई बांटी जा रही है तो कहीं आतिशबाजी हो रही है। भाजपा कार्यालयों के बाहर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लग गया है और हर कोई मोदी को जीत की बधाई दे रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा 'महाविजय+महानायक+महोत्सव=मोदी'।


Wednesday, May 22, 2019

मोदी का मिशन 2022




सुरभि भावसार

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आना अभी बाकी है लेकिन एग्जिट पोल से ही बाग़-बाग़ हुई भाजपा अपनी मिशन 2022 पर रणनीति बनाने लगी है। एग्जिट पोल में दिख रही नरेंद्र मोदी की सत्ता में शानदार वापसी से भाजपा पूरी तरह कॉंफिडेंट है, वही विपक्ष ईवीएम को बड़ा मुद्दा बनाने में जुटा है।

एक ओर विपक्षी नेताओं का बैठकों का दौर और ईवीएम को मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है वही दूसीर और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एनडीए नेताओं को डिनर पर बुलाया था। दिल्ली की अशोका होटल में नतीजों के बहाने हुई इस चुनावी डिनर पार्टी में चर्चा 2022 को लेकर हुई। इस पार्टी में नरेद्र मोदी और अमित शाह 2022 का एजेंडा समझा रहे थे।

इस चुनाव में अपनी शानदार जीत को लेकर कॉंफिडेंट अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने न केवल अपने सहयोगियों को साधा बल्कि अगले पांच में उन्हें क्या करना है और किन रास्तों पर चलना है ये भी समझा दिया। इससे पहले भाजपा मुख्यालय में हुई एनडीए की बैठक में भी कुछ प्रस्ताव मिशन 2022 से जुड़े रहे।

इसलिए खास है '2022'


2022 में देश की आजादी के 75 साल पूरे होने जा रहे है। ऐसे में भाजपा ने इस समय तक अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरा करने का टारगेट रखा है। इसके साथ ही भाजपा साल 2022 को अपनी उपलब्धियों के जरिए यादगार बनाने की कोशिश में जुटी हुई है।

मंगलवार को भाजपा मुख्यालय पर हुई एनडीए की बैठक में 2022 के लिए जो प्रस्ताव पारित हुआ है वह है- 'हम संकल्प करते हैं कि 2022 में भारत आजादी के 75 साल पूरे करेगा।  हमारा प्रयास है कि हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस मजबूत, समृद्ध, विकसित और समावेशी भारत का सपना देखा हम उन सपनों को पूरा करें और उन्हें आकार दें।'

भाजपा की 2022 को लेकर चल रही तैयारियों से कहा जा सकता है कि पार्टी के लिए 2022 बहुत अहमियत रखता है। इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 2019 आम चुनाव के नतीजे आने से पहले ही भाजपा 'मिशन 2022' पर काम करने लगी है।

Tuesday, May 21, 2019

कौन बनेगा प्रधानमंत्री? नाम बताओ, कैशबैक पाओ




लोकसभा चुनाव के नतीजे 23 मई को आने वाले है लेकिन उससे पहले आए एग्जिट पोल के नतीजे एक बार फिर मोदी की सत्ता में वापसी करा रहे है। एग्जिट पोल के बाद पूरे देश की नजरे 23 मई के इंतजार में है क्योकि इसी दिन साफ़ होगा कि केंद्र की सत्ता किसके हाथ में होगी। सरकार बनाने को लेकर विपक्षी दलों में बैठकों का दौर जारी है।

इसी बीच ऑनलाइन फ़ूड डिलीवरिंग प्लेटफॉर्म जोमैटो ने एक खास ऑफर जारी किया है। 'जोमैटो इलेक्शन लीग' ऑफर के तहत ग्राहकों को 23 मई से पहले अगले प्रधानमंत्री के नाम की भविष्यवाणी करने का मौका मिल रहा है। जिस भी ग्राहक की भविष्यवाणी सही हुई उसे खाना आर्डर करने पर कैशबैक मिलेगा।

कंपनी ने बयान जारी कर कहा कि 'जोमैटो इलेक्शन लीग'  ऑफर के तहत ग्राहकों को अगले प्रधानमंत्री के नाम की सटीक भविष्यवाणी करने पर कैशबैक मिलेगा। कंपनी ने कहा कि "ग्राहकों को हर ऑडर पर 40 प्रतिशत का डिस्काउंट दिया जाएगा और अगर उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई तो उन्हें 30 प्रतिशत का कैशबैक मिलेगा।"

कंपनी ने आगे कहा कि 'देश में जैसे ही नया प्रधानमंत्री चुन लिया जाएगा, ग्राहकों के वॉलेट में कैशबैक आ जाएगा।" इस ऑफर का फायदा आप 22 मई तक उठा सकते है। जोमैटो के मुताबिक अभी तक भारत के 250 शहरों से 3 लाख 20 हजार लोगों ने इसमें भाग लिया है।


Monday, May 20, 2019

फिर सटीक बैठेंगे एग्जिट पोल या 23 मई को हो जाएंगे गोल?




सुरभि भावसार 

लोकसभा चुनाव का शोर आज थम गया है। चुनाव ख़त्म होने के बाद आए एग्जिट पोल में एक बार फिर मोदी सरकार सत्ता में वापसी करती दिख रही है। एग्जिट पोल में एनडीए को मिल रही बढ़त ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। 2014 की तरह 2019 में भी मोदी का जादू चलता नजर आ रहा है।

तमाम टीवी चैनलों पर आए एग्जिट पोल के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी एक बार फिर संसद में प्रधानमंत्री के रुप में बैठने जा रहे है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए विधानसभा में मिली करारी हार के बाद लोकसभा चुनाव में पूरे दमखम के साथ उतरी भाजपा शानदार जीत के साथ लौट रही है।

एग्जिट पोल के आंकड़ों की बात करे तो ज़ी न्यूज़ के मुताबिक़ एनडीए को 300 सीटें, कांग्रेस को 128 सीटें और अन्य को 114  सीटें मिल रही है। टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल भाजपा को 306 सीटें, कांग्रेस को 142 सीटें और अन्य को 94 सीटें मिल रही है। वही इंडिया टुडे के सर्वे पर नजर डाले तो यहां एनडीए को 339 से 365 सीटें, यूपीए को 77 से 110 सीटें और अन्य को 59 से 79 सीटें मिल रही है।

एग्जिट पोल के आंकड़ों से साफ़ दिख रहा है कि देश में एक बार फिर कमल खिलने जा रहा है. यदि ये एग्जिट पोल सही बैठे तो  भाजपा का 'अबकी बार 300 पार' वाला नारा सही साबित होगा। हालांकि स्थिति 23 मई को साफ़ होगी कि केंद्र की सत्ता बदल जाएगी या एक बार फिर कमल खिलेगा।

ये जरुरी नहीं है कि 23 मई को ये एग्जिट पोल सटीक बैठेंगे। इन एग्जिट पोल पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता क्योकि ऐसा भी हुआ है जब एग्जिट पोल पूरी तरह फ्लॉप हुए है। ऐसा एक बार नहीं बल्कि दो चुनावों में लगातार एग्जिट पोल फ्लॉप साबित हुए है।

2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब एग्जिट पोल बता रहे थे कि वह सत्ता में आसानी से वापसी कर लेंगे। एग्जिट पोल में एनडीए को 248 सीटें, यूपीए को 190 और अन्य को 105 सीटें दी जा रही थी लेकिन जब नतीजे आए तो ये आंकड़ें पूरी तरह पलट गए और एनडीए सिर्फ 190 सीटों पर सिमट गई। यूपीए 222 सीटों के साथ सत्ता में आई और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने।

इसके बाद एग्जिट पोल 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय नाकाम रहे। उस चुनाव में भी भाजपा को जेडीयू-आरजेडी गठबंधन पर भारी बताया जा रहा था लेकिन जब नतीजे आए तो भाजपा बुरी तरह पिछड़ गई। भाजपा को केवल 58 सीटें मिली थी, वही लालू नीतीश की जोड़ी ने 178 सीटों पर परचम लहराया।

इस स्थिति को देखते हुए एग्जिट पोल पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता। अब 23 मई को ही साफ़ होगा कि एग्जिट पोल फिर सटीक बैठेंगे या हो जाएंगे गोल?

Saturday, May 18, 2019

महादेव दिलाएंगे महाविजय!



सुरभि भावसार 

लोकसभा चुनाव के प्रचार का शोर थम गया है। चुनाव में ताबड़तोड़ प्रचार के बाद और चुनाव नतीजों से पहले प्रधानमंत्री मोदी उत्तराखंड के बर्फीले पहाड़ों के बीच एकांत में चुनावी शोर से दूर महादेव की शरण में पहुंचे और भोलेनाथ से जीत की मंगल कामना की। यहां मोदी पूरी तरह से भोले की भक्ति में डूबे नजर आए, जहां उनका प्रधानसेवक के अलावा शिवसाधक का रुप भी देखने को मिला।



वहीं केदारनाथ पहुंचकर मोदी ने करीब आधे घंटे तक शिव साधना की। पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर की परिक्रमा की और वहां के विकास कार्यों का जायजा भी लिया।

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स्लेटी रंग का चोगा, पहाड़ी टोपी और कमर में केसरिया गमछा आज चर्चा का विषय बन गया। आज जब इस अंदाज में मोदी वहां पहुंचे तो सबकी नज़रे उनके इस नए रुप पर टिक गई। इतना ही नहीं 11755 फीट की ऊंचाई पर स्थित बाबा केदार के दर पर मोदी हेलीपैड से पैदल चलकर मंदिर पहुंचे।



मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद ध्यान साधना के लिए मोदी करीब दो किलोमीटर की ट्रैकिंग कर पहुंचे। भगवा चोला ओढ़े मोदी गुफा में ध्यान साधना में मग्न है। मोदी की यह ध्यान साधना रविवार तक चलेगी।

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इससे पहले काशीपुत्र की यह भक्ति उन्ही के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में देखने को मिली थी। नामांकन भरने के एक दिन पहले मोदी रोड शो करने के बाद गंगा आरती में शामिल हुए थे। इस दौरान मोदी मां गंगा की भक्ति में डूबे हुए थे और मंत्रमुग्ध नजर आए।



एक और जीत का आशीर्वाद मांगने मोदी केदारनाथ पहुंचे तो दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी सोमनाथ के दर पर पहुंचे और अपनी पार्टी के लिए भगवान शिव से विजयी वरदान मांगा। मां गंगा की भक्ति और महादेव की अराधना मोदी को कितनी बड़ी जीत दिलाती है ये तो 23 मई को ही साफ़ हो पाएगा।




Friday, May 17, 2019

दुनिया में पहुंचा इंदौर का चटपटा स्वाद, UNESCO से मिलेगी पहचान




मध्यप्रदेश का इंदौर शहर अपने चटपटे खाने के लिए पहचाना जाता है। हर तरह के खाने का स्वाद आपको इंदौर में मिल जाएगा। रात को लगने वाला सराफा बाजार और 56 दुकान तो खाने के लिए इंदौर की पहचान बन चुके है। खास बात तो ये है कि 56 दुकान का स्वाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और सराफा के खाने का चटकारा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ले चुके है। 

अभी तक तो इंदौरी पोहा, नमकीन और चाट के स्वाद के अभी तक केवल देश के लोग ही कायल थे लेकिन अब इंदौर के स्वाद को अतंरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने वाली है। इंदौर का सिर्फ खाना ही नहीं बल्कि रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर को भी इस लिस्ट में शामिल करने की कवायद जारी है। 

आज आपको इंदौर के ऐसे ही कुछ खास व्यंजनों के बारे में बता रहे है-

पोहा



कहते है यदि कोई इंदौर आया और उसने यहां का पोहा नहीं खाया तो क्या खाया। इंदौरी पोहा पूरे देश में पसंद किया जाता है। सुबह उठते ही इंदौरियों का मन पोहा-जलेबी खाने के लिए ललचाने लगता है। 

साबूदाने की खिचड़ी



साबूदाने की खिचड़ी अधिकतर उपवास के दौरान बनाई जाती है। इंदौरी साबूदाना खिचड़ी में चिप्स, फरयाली चिवड़ा और हरा धनिया डाला जाता है। इसके साथ ही इसमें कई तरह के मसाले भी डाले जाते है जिसके कारण इसका स्वाद अपनेआप में अलग हो जाता है। 

गराडू



वैसे तो गराडू, रतालू मध्य भारत में पाए जाते है लेकिन इंदौरी शैली में तले हुए गराडू की पहचान की अलग है। ये गराडू इंदोरियो की पहली पसंद होने के साथ ही इंदोरियो के लिए चर्चा का विषय है। 

कचौरी



बारिश का मौसम होऔर इंदौर की कचोरी मिल जाए तो मजा दोगुना हो जाता है। जिस दुकान की कचौरी जितनी कुरकुरी और फोसरी हो उसके आगे उतनी ही ज्यादा भीड़ लगी होती है। लहसुन-हरी मिर्च की चटनी, इमली-खजूर की लाल चटनी, प्याज-गाजर का कचूमर, इन चटनियों और कचूमर को जब कचोरी के साथ दिया जाता है तो ये कचोरी अपनेआप में अलग हो जाती है और इंदौर की पहचान बन जाती है। 






Thursday, May 16, 2019

बंगाल की जंग, ममता फिर बनी नं 1!




लोकसभा चुनाव में अब केवल आखिरी चरण का मतदान बाकी है। चुनावी जंग की आखिरी लड़ाई बंगाल में लड़ी जा रही है। बंगाल में रण में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के बीच आर-पार की लड़ाई है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में भगवा रंग चढ़ने ही लगा था कि वह लाल रंग में रंगने लगी। ममता बनर्जी अकेले ही भाजपा का सामना कर रही थी कि अब उन्हें पूरे विपक्ष का साथ मिलने लगा है।

दरअसल, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद चुनाव आयोग ने सख्ती दिखाई और चुनाव प्रचार का समय कम कर दिया। चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार को गुरुवार रात 10 बजे तक के लिए सिमित कर दिया। चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी लगातार भाजपा पर हमला बोल रही है।

ममता बनर्जी के इस विरोध को पूरे विपक्ष का साथ मिला है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती तक ममता के साथ खड़े हो गए है। ममता के समर्थन में अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, केसीआर, चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं ने ट्वीट किया है। विपक्ष की तरफ से एकमुश्त कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली दिन में है, इसी वजह से EC ने रात को बैन लगाया है।

ऐसी स्थिति में ये कहना गलत नहीं होगा कि चुनाव ख़त्म होने से पहले ममता बनर्जी के पीछे पूरा  विपक्ष खड़ा हो गया है और ममता उनकी अगुवाई कर रही है। या ये भी कह सकते है कि मोदी-शाह से भिड़कर ममता एक बार फिर नंबर 1 बन गई है।

नतीजों से पहले विपक्ष का यूं एक होना भाजपा की मुश्किल तो बढ़ा ही रहा है, इसके साथ ही ममता बनर्जी को भी विपक्षी नेताओं की प्रमुख रेस में आगे खड़ा कर सकती हैं। हालांकि ये तो देखने वाली बात होगी कि विपक्ष की ये एकता कितने दिन टिकती है।

Wednesday, May 15, 2019

दीदी के बंगाल से गायब हुई 'ममता'


सुरभि भावसार 

पश्चिम बंगाल में भले ही टीएमसी की ममता सरकार हो लेकिन अभी जो हालात वहां चल रहे है वो 'ममता' के बिलकुल विपरीत है। इन दिनों बंगाल की राजनीति हिंसक होती दिख रही है। जैसे ही बंगाल की राजनीति में भगवा रंग चढ़ने लगा तो वहां की राजनीति लाल रंग में रंगने लगी। ममता राज में चुनाव-प्रचार लहुलुहान होने लगा है।

जी हां, मामला और कुछ नहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुए हिंसा और बवाल का है। मंगलवार को अमित शाह कोलकाता में 7 किलोमीटर लम्बा रोड शो कर रहे थे। इस दौरान वहां जमकर बवाल और हिंसा हुई। वाहनों में आग लगा दी गई जिसके कारण रोड शो बीच में ही ख़त्म करना पड़ा।

इस बवाल के भाजपा और टीएमसी के बीच ना केवल जुबानी जंग तेज हो गई है बल्कि दोनों पार्टियों के बीच वीडियो वॉर भी छिड़ गया है। दोनों पार्टियों ने सबूत के तौर पर वीडियो जारी कर इस हिंसा के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार बताया है।

इस मामले में बुधवार को अमित शाह ने प्रेस कांफ्रेंस कर इस हिंसा के लिए सीधे तौर पर ममता बनर्जी को जिम्मेदार बताया है और कहा कि यदि CRPF नहीं होती तो मेरा वहां से बचकर निकल पाना मुश्किल पाना था। अमित शाह के इस बयान से यह कहा जा सकता है कि बंगाल में हिंसा कितनी बढ़ गई है।

इस दौरान अमित शाह ने चुनाव आयोग पर भी सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग मूकदर्शक बनकर बैठा है और टीएमसी हिंसा करती जा रही है। अगर ऐसा ही चुनाव होता रहा तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होने लगेंगे।

इतना ही नहीं टीएमसी द्वारा हिंसा के लिए भाजपा को जिम्मेदार बताने पर अमित शाह ने कहा कि 6 चरणों के चुनाव में केवल बंगाल में हिंसा हुई है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी केवल 42 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और भाजपा हर राज्य में चुनाव लड़ रही है लेकिन हिंसा केवल पश्चिम बंगाल में हो रही है।

इतना ही नहीं टीएमसी ने भाजपा पर ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने का भी आरोप लगाया था जिसका जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा कि ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्तियां भी टीएमसी वालों ने ही तोड़ी थीं, हम तो बाहर थे अंदर ही नहीं जा सकते थे। शाह ने सवाल उठाते हुए पूछा कि जब मेन गेट ही बंद था और बीजेपी वाले बाहर थे, तो कोई अंदर कैसे घुसा और किसने मूर्ति तोड़ दी। ये ही सबूत है कि ईश्वरचंद विद्यासागर की प्रतिमा को टीएमसी वालों ने ही तोड़ा है।

बंगाल में हुई हिंसा की चर्चा पूरे देश में हो रही है। दिल्ली से लेकर बंगाल तक इसका विरोध हो रहा है। इस समय देश में चुनावी हिंसा की घटनाएं बेहद कम हो रही है तो वही पश्चिम बंगाल ममता की खूनी राजनीति से लाल होता जा रहा है। ऐसे में 2019 की लड़ाई में जनता की निगाहें सबसे ज्यादा कही टिकी है तो वो पश्चिम बंगाल है। अब ये तो 23 मई को ही साफ़ हो पाएगा कि बंगाल में ममता की टीएमसी सत्ता की कुर्सी पर बैठेगी या वहां की राजनीति पर भगवा रंग चढ़ेगा।



Tuesday, May 14, 2019

क्या अब लोकतंत्र के मंदिर में ऐसे लोग बैठेंगे?


सुरभि भावसार

लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिए राजनीतिक पार्टियां ताबड़तोड़ रैलियां और रोड शो कर जनता को अपने पक्ष में करने में जुटी है। इनमें झूठे-सच्चे वादे और बेतुके बयान देकर मर्यादा को तार-तार कर रहे हैं। चुनाव जीतकर लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद पहुंचने के लिए क्या नेता अपनी मर्यादा लांघ जाएंगे? क्या महिलाओं का सम्मान करना भूल जाएंगे? चुनावी माहौल में जुबानी जंग होना आम बात है लेकिन जब किसी नेता की भाषा इतनी गिर जाए तो आप क्या कहेंगे?

हाल ही में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खां ने भाजपा उम्मीदवार जया प्रदा पर एक बार फिर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। पहले भी वह जया प्रदा के चरित्र को लेकर बयान दे चुके है लेकिन इस बार तो ये जुबानी जंग इतनी बढ़ गई कि वह जाया प्रदा के कपड़ों पर टिप्पणी कर बैठे।

शर्म आती है नेताओं के ऐसे बयानों पर कि चुनाव जीतने के लिए अब ये महिलाओं पर टिप्पणी करने लगेंगे। आजम खां ने इस शर्मनाक बयान पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पलटवार करते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा कि 'मुलायम भाई, आप समाजवादी पार्टी के पितामह हैं।आपके सामने रामपुर में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा है, आप भीष्म की तरह मौन साधने की गलती ना करें।' हालांकि सुषमा स्वराज के इस बयान का कोई असर नहीं होना है क्योकि उनकी पार्टी में भी भीष्म पितामाह की स्थिति मौन पुरुष की तरह है। ये कोई नई बात नहीं है त्रेता युग में भी भीष्म पितामाह मौन थे और इस कलयुग के भी भीष्म पितामाह मौन है।

आजम खां ही नहीं उनसे पहले केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे ने भी राजद नेता राबड़ी देवी पर टिप्पणी की है। अश्विनी चौबे ने राबड़ी देवी को घूंघट में रहने की सलाह दे डाली। उन्होंने कहा था कि ‘‘राजग में कोई दिक्कत नहीं है। मैं राबड़ी देवी के बारे में क्या कहूं? वह मेरी भाभी हैं। बेहतर होगा यदि वह घूंघट में रहें।’’ 

ये कोई पहला मौका नहीं है जब नेता इस तरह के बयान दे रहे है। इससे पहले भी महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले कई नेता महिलाओं पर टिप्पणी कर चुके है। महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने और सशक्त बनाने के लिए टीवी पर बहस करने से पहले महिलाओं की इज्जत करना सीखना होगा।