सुरभि भावसार
जब देश के जवान सरहद पर तैनात होते है तो वो राजनीति नही करते। मां भारती की रक्षा के लिए उस जवान के लिए देशसेवा ही सबकुछ होती है। खून में देशभक्ति, जुबान पर 'जय हिंद' का नारा और आंखों में दुश्मनों के लिए गुस्सा, भारतीय सेना का देश के लिए यही समर्पण देखकर ही दुश्मन कांप उठता है। इन जवानों को दिल्ली की गद्दी पर बैठने वालों के कानून से कोई मतलब नहीं होता लेकिन जब सेना के समर्थन की बात आती है तो कुछ राजनीतिक दल वोटबैंक के लिए इसका विरोध करने से भी पीछे नहीं हटते है।
आतंकियों के खिलाफ जब कोई बात सदन में हो या सदन के बाहर हो तो हमेशा उसका विरोध करते है। जब सदन में आतंकवाद के खिलाफ सरकार क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 (यूएपीए बिल) लाई तो सोनिया गांधी सहित पूरी कांग्रेस ने सदन से वॉकआउट कर दिया।
दरअसल, इस बिल से एनआईए को मजबूती मिलेगी और आतंकवाद पर नकेल कसेगी। इस बिल के तहत यदि कोई व्यक्ति आंतकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है या उसमें भाग लेता है तो उसे आतंकवादी घोषित किया जाएगा। यानी अब सरकार किसी संगठन के साथ-साथ किसी व्यक्लती विशेष को भी आतंकी घोषित कर सकती है।
आतंकवाद के खिलाफ इस अहम् बिल पर चर्चा के दौरान कांग्रेस का सदन से वॉकआउट कर जाना तमाम सवालों को जन्म दे रहा है। कांग्रेस को आतंकियों को आर्थिक मदद करने वाले ओर जेहादी साहित्य से आतंकी बनाने वाले लोगो से क्या सहानुभूति है जो कांग्रेस ने वोट करने की बजाय सदन का बहिष्कार कर दिया? कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस देश के साथ खड़ी है या आतंकियों के साथ?
इधर, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती कश्मीर में अतिरिक्त 10 हजार जवानों की तैनाती का विरोध कर रहीं हैं। उनक कहना है कि कश्मीर में अतिरिक्त जवानों की तैनाती ने डर का माहौल पैदा कर दिया है। आज महबूबा को उस सेना से डर लग रहा है जो सेना कश्मीर में आई बाढ़ के समर कश्मीरियों के लिए देवदूत बनकर खड़ी हो गई थी। महबूबा को सेना की तैनाती का डर है या आतंकवाद के खात्मे का ?
यहां ये कहना गलत नही होगा किआतंकवाद को ख़त्म करने के लिए केवल आतंकवादियों को ख़त्म करना ही काफी नहीं है। इसके लिए सबसे पहले उन्हें ख़त्म करना होगा जो आतंकियों को आथिॅक सहायता देते है और उन्हें पालते हैं। ऐसे में जब तक देश के सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आकर एक स्वर में आतंकवाद के पनाहगारों को जड़ से ख़त्म करने के लिए आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक देश में कितने भी आतंकियों का सफाया कर दे, दीमक रुपी आतंकवाद का पूर्ण रूप से क्रियाक्रम असंभव सा लगता है।







