सुरभि भावसार
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में उथल-पुथल चल रही है। हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की थी लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इसे नामंजूर कर दिया है। हालांकि राहुल गांधी अभी भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। अभी ये तो नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी के इस्तीफा देने से पार्टी कमजोर हो जाएगी या नया अध्यक्ष मिलने से मजबूत होगी लेकिन ये बात भी सभी जानते है कि 2014 में हर कोई कांग्रेस छोड़ने को तैयार था, उस समय राहुल ने अकेले के दम पर ही कांग्रेस को उभारा था। इसके अलावा राहुल गांधी के ही नेतृत्व में पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मात देने में सफल हो पाई है।
राहुल गांधी के इस फैसले के बाद उन्हें पार्टी के कई नेता मनाने पहुंचे लेकिन वह नहीं माने। जब पार्टी अध्यक्ष पद के लिए प्रियंका गांधी का नाम आया तो राहुल ने इससे भी मना कर दिया और कहा कि पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का होना चाहिए। प्रियंका को इन सबमे नहीं खींचे।
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सूत्रों की माने तो राहुल गांधी ने पार्टी आलाकमान को एक महीने का वक्त दे दिया और कहा कि एक महीने में नया अध्यक्ष खोज लें। हालांकि राहुल गांधी ने यह भी कहा है कि वह लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करने को तैयार हैं और पार्टी में अन्य भूमिका में काम करते रहेंगे लेकिन अध्यक्ष पद पर नहीं रहना चाहते।
पार्टी में चल रहे इस सियासी संकट में पार्टी आलाकमान के सामने नया अध्यक्ष खोजना एक नई चुनौती बन गई है। अब देखना ये होगा कि आलाकमान नया अध्यक्ष खोजती है या राहुल गांधी को मनाने में कामयाब होती है।
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एक बात ये भी है कि राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर जो कुछ भी चल रहा है उसे अब लोग नौटंकी बताने लगे है। लोगों का कहना है कि राहुल गांधी को इस्तीफा देना है तो दे दें, ये बेवजह का दिखावा क्यों कर रहे है। वैसे भी इस्तीफा उन्हें ही देना है और स्वीकार भी खुद ही करना है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अब किसी की कोई रुचि नहीं है कि राहुल गांधी अध्यक्ष के पद पर है या नहीं।
हिंदुत्व को ओढ़ने की कोशिश और खुद को शिवभक्त बताने में पार्टी पहले ही अपना नुक्सान करवा चुकी है। अब राहुल के इस्तीफे का दिखावा पार्टी को नुक्सान के सिवा और कुछ नहीं देगा। कांग्रेस ये क्यों नहीं समझ पा रही है कि उनके झूठे खेल से लोगों का मन भर चुका है।
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